रिश्ते नाते खाक़ हुए के दरमियां1 आ गयीं गुरुर2 की दीवारें ,
दोस्ती नायाब रिश्ता थी , छा गयीं तकल्लुफ की दीवारें।
मुहब्बतें परवान न चढ़ सकीं , आ गयीं समाज की दीवारें।
जुस्तजू3 मिलने की थी बहुत , छा गयीं ख़ामोशी की दीवारें।
दरिया में रवानी थी बहुत मख़सूस4 ,
हैरान है दरिया, के आ गयीं बांधों की दीवारें ।
सीना चाक कर खोख्ला कर दिया ज़मीन को हमने ,
उरूज5 हों गयीं सतह पर संगो-ख़िस्त6 की दीवारें।
इस दर पर अब उनका ठिकाना नहीं , अफ़सोस ,
हरदम मुझसे कुछ बोलती हैं , पर घर की दीवारें।
बहुत तल्खी7 मिजाज़ में है आजकल कू-ब- कू8 ,
कुछ ऐसा करो कि ढह जाएँ नफरत की दीवारें।
वक़्त मुझ पर मेहरबान हो तो कैसे हो ,
दरमियां जो आ गयीं मसरूफियत9 की दीवारें।
फ़ना होना हर शै की कुदरत मैं हैं, बेशक ,
मौत को भला रोक पाएंगी दौलत की दीवारें।
शायद काफी नहीं याद करना उनको फ़क़त10 दो दिन ,
सुपुर्दे-ख़ाक11 हो गए जो बनकर सरहद की दीवारें।
1.दरमियां – बीच में , 2, गुरुर -घमंड , 3, जुस्तजू -इच्छा/ बेचैनी ,
4, मख़सूस -खास , 5, उरूज -ऊंची , 6, संगो ख़िस्त -ईंट -पत्थर ,
7, तल्खी -कड़वाहट /गर्मी , 8. कू-ब-कू- चारों तरफ ,
9. मसरूफियत -व्यस्तता ,10. फ़क़त -सिर्फ/केवल ,
11. सुपुर्दे ख़ाक-मिट गए /मिट्टी में मिल गए



वाहहह वा ! बहुत खूब मोहतरम !