My Ghazals

मैं तो एक चराग़ हूँ

यह दीपावली कविता “मैं तो एक चराग़ हूँ” सभी को उजाला और उम्मीद देती है।

ख़ुद को जलाकर, दुनिया तेरी रौशन करता रहूँगा,
मैं तो एक चराग़ हूँ, यूँ ही सदा जलता रहूँगा।

न शिकवा हवा से मुझे, न गिला आँधियों से,
जज़्बा-ए-रौशनी दिल में लिए, जलता रहूँगा।

कभी शम्मा बनूँ, या कभी शोला बन जाऊँ,
मक़सद मेरा उजाला है — फैलाता रहूँगा।

दीवारें रोकें, चाहे डराएँ घने साये मुझको,
अपने उजाले से हर अँधेरा चीरता रहूँगा।

जब कभी उदासी घिर आए वक़्त के अंधेरों में,
उदास आँखों में आशा की चमक भरता रहूँगा।

गर कभी घिर जाओ तुम उजालों से अंधेरों में ,
तेरे अंधेरों का निगेहबान बन डटता रहूँगा।

तेरी खामोश नज़रों में जो हल्की-सी चमक है,
मेरा ही अक्स है — इसी गुमाँ में जीता रहूँगा।

तू साथ दे या फिर किनारा कर ले मुझसे,
तेरी राहों में सदा रौशनी करता रहूँगा।

तेरी मुस्कराहट पर मेरी रौशनी भी शर्माए ,
तेरी मुस्कराहट का तलबगार बनता रहूँगा।

मैं तो एक चराग़ हूँ Read More »

Shatranj शतरंज

तुम हो वज़ीर हुश्न के, जिधर चाहो, रुख कर लो,
मैं तेरी आशिकी का प्यादा हूँ, लौटने का हुनर हमको नहीं आता।

हो तेरी हर चाल में शोखी-ए-उस्तादी, इसकी बिसात पर,
हम तो बढ़ चले तेरे इश्क़ में, हारना-जीतना हमको नहीं आता।

तेरी चाहत की बाज़ी में, हमको मरना भी कबूल है,
शह और मात का है ये खेल, तेरे लिए, हमको ये हुनर नहीं आता।

अजीब खेल है ये शतरंज का, हर मोहरे की चाल मुक़र्रर है,
कुर्बान हो जाएं सब बादशाह की खातिर, ये खेल हमको समझ नहीं आता।

Shatranj शतरंज Read More »

Kirdaar

तमाम झूठे इल्ज़ाम तुम पर हों,
फिर भी सर झुकाना ग़र फितरत है ।

और सारे शक-ओ-ग़ुबार तुम पर हों,
पर ख़ुद पर भरोसा करना हिम्मत है ।

सब्र करना ग़र तेरे किरदार में है ,
तो फिर इंतज़ार कहाँ ज़हमत है ।

नफ़रतों का जवाब नफ़रत नहीं बेशक़,
रक़ीबों में हुनर ढूँढना एक इबादत है ।

ख़्वाबों की ताबीर अच्छा शग़न है,
ग़र ख़्वाब मंज़िल हैं तो हिमाक़त है ।

ख़यालों में उड़ान है तो कोई हर्ज नहीं,
ग़र ख़याल मक़सद है तो हिमाक़त है ।

कोई आफ़त हो या हो ज्श्न-ए कामयाबी,
इत्मिनान रखना फज़ले इफ़्फ़त है ।

जिस्म-ओ-जान टूट भी जाये तो क्या,
एक नेक इरादा है, जो तेरी हिम्मत है ।


(Inspired by  Poem  “If…” by Rudyard Kipling)

Kirdaar Read More »

Darakht

न    काटो   बेदर्दी    से पेड़ों को , शाखों को दर्द होता होगा ,
परिंदों का बसेरा हैं इन पर ,उनका दिल भी तो रोता होगा।

सुबह-ओ- शाम होती हैं परिंदों की चैचहाहट की सरगम ,
न    जाने     कैसी    शाम    और   अब   कैसा सवेरा होगा।

इनकी चाहत में बादल भी झुक आतें है , प्यार बरसाते हैं,
बिन  बारिश क्या इस धरती पर अपना भी गुजारा होगा।

हवाओं     के     संग     झूम    उठती   हैं ये नाजुक पत्तियां ,
आज़ाद    हवाओं का न जाने अब किससे याराना होगा।

ज़िन्दगी    का    सिलसिला , हमारी   साँसों    में इनसे हैं
बिन    पेड़ों      के    क्या   इंसान का नामो-निशां होगा।

तो आओ आज हम अहद कर लें ,
एक बूढ़े दरख़्त की रुखसती से पहले ,
दो पौधों को जवाँ कर लें ।।  

Darakht Read More »

Deewaren

रिश्ते नाते खाक़ हुए के दरमियां1 आ गयीं  गुरुर2 की दीवारें ,
दोस्ती    नायाब रिश्ता थी , छा   गयीं   तकल्लुफ की दीवारें।

मुहब्बतें परवान न चढ़ सकीं ,   आ गयीं समाज की दीवारें।
जुस्तजू3 मिलने की थी बहुत ,  छा गयीं ख़ामोशी की दीवारें।

दरिया     में      रवानी    थी            बहुत            मख़सूस4 ,
हैरान     है    दरिया,    के आ    गयीं    बांधों    की  दीवारें ।

सीना    चाक    कर    खोख्ला कर दिया   ज़मीन को हमने ,
उरूज5    हों   गयीं    सतह   पर संगो-ख़िस्त6   की दीवारें।

इस   दर   पर      अब     उनका   ठिकाना नहीं , अफ़सोस ,
हरदम     मुझसे    कुछ   बोलती   हैं ,   पर   घर की दीवारें।

बहुत     तल्खी7       मिजाज़   में    है आजकल   कू-ब- कू8 ,
कुछ    ऐसा     करो     कि    ढह     जाएँ नफरत की दीवारें।

वक़्त     मुझ     पर      मेहरबान     हो      तो     कैसे     हो ,
दरमियां       जो     आ     गयीं      मसरूफियत9 की दीवारें।

फ़ना      होना       हर    शै     की     कुदरत  मैं हैं,   बेशक ,
मौत      को      भला    रोक    पाएंगी     दौलत   की   दीवारें।

शायद      काफी   नहीं   याद करना उनको फ़क़त10 दो दिन ,
सुपुर्दे-ख़ाक11     हो    गए जो    बनकर    सरहद   की दीवारें।


1.दरमियां – बीच में , 2, गुरुर -घमंड , 3, जुस्तजू -इच्छा/ बेचैनी ,
4, मख़सूस -खास , 5, उरूज -ऊंची , 6, संगो ख़िस्त -ईंट -पत्थर , 

7, तल्खी -कड़वाहट /गर्मी , 8. कू-ब-कू- चारों तरफ , 

9.  मसरूफियत -व्यस्तता ,10. फ़क़त -सिर्फ/केवल , 

11. सुपुर्दे ख़ाक-मिट गए /मिट्टी में मिल गए

Deewaren Read More »

तो अच्छा है…

शराब पुरानी हो, तो अच्छा है ,
हर उम्र में रवानी हो, तो अच्छा है।

होठो पे तबस्सुम हो, तो अच्छा है ,
आँखों में सपनें हों, तो अच्छा है।

दुनिया में लोग मिलते हैं , बिछड़ जाते हैं,
ज़िन्दगी में हमसफ़र हो, तो अच्छा है।

बेज़ुबान भी महफ़िल में हैं तमाम ,
मन की बातें समझे कोई , तो अच्छा है।

ग़मे-इश्क़ में डूबना कोई गुनाह नहीं ,
डूबकर उभर जाओ , तो अच्छा है।

फूलों को दामन से लगाना तो आम है ,
कांटें भी दामन से लगाओ , तो अच्छा है।

यूँ ही मिल जाये तो , वो मंज़िल नहीं ,
रास्तों में पत्थर हों , तो अच्छा है।

तो अच्छा है… Read More »

काजल

काजल हूँ तेरी आखों का, कभी आंसूं भी दूंगा ,
ज़िन्दगी में बहारों की मग़र रौशनी भी दूंगा।

 

ज़माने की शोख नज़रों से बचाऊँगा तुझको ,
सीने से मैं ही तो लगाऊंगा तुझको।

 

दिल में कोई बात हो तो कह देना ,
पलकों में छुपा के मुझको रो लेना।

 

तेरे अश्कों की गर्मी से पिघल जाऊँगा ,
फिर भी तेरे अश्कों में झिलमिलाऊँगा।

 

तू जब फिर से मुस्कुराएगी ,
मुझे फिर पलकों पे लगाएगी।

 

फिर तेरी आँखों में बस जाऊँगा ,
एक दिन तेरे दिल में उतर जाऊँगा।

काजल Read More »

इंतज़ार

यूँ तो हर कदम पे लोग मिलते है,
हम तेरी ही राह तकते जाते हैं।

तुम न आओगे अभी,मालूम है,
फिर भी तेरा इंतज़ार किये जाते है।

तुम करो न करो याद हमें ,
आप हमें बहुत याद आते हैं ।

तन्हाईयों की महफ़िल में हमें ,
तेरे ही अक्स नज़र आते है।

शब् की तारीकियों में हम,
क्यों करवटें बदले जाते हैं।

तुझे मेरा साथ गवारा हो न हो ,
हम तेरे साथ के सपने बुने जातें है।

जाने कब ज़िन्दगी की शाम हो जाये ,
अधूरी हो तुम, क्यों हम अधूरे जिए जाते हैं।



इंतज़ार Read More »

और भी हैं

क्यों बेचैन है उसकी खातिर ,
दिल बहलाने के बहाने और भी हैं।

 

तेरी चाहत के अलावा इस दुनिया में ,
ग़म के फ़साने और भी हैं।

 

क्यों आँखों में है तश्वीर उन्ही की ,
देख ज़माने में नज़ारे और भी हैं।

 

क्यों उससे तुझे है वफ़ा की उम्मीद ,
ज़माने में बेवफा और भी हैं।

 

उसकी मुहब्बत के जाम को तरसा तो क्या ,
दुनिया में मयखाने और भी हैं।

और भी हैं Read More »

कभी आसान कोई मंज़िल नहीं मिलती

कभी आसान कोई मंज़िल नहीं मिलती ,
क्यों न फिर हटके कोई काम किया जाये।

बने बनाये रास्तों पर तो कोई भी चल लेगा ,
क्यों न फिर खुद अपना रास्ता बनाया जाये।

सच की डगर पे चलना है बहुत मुश्किल,
क्यूँ न फिर इस डगर पे चल कर देखा जाये।

समंदर की तह में जाने पे मिलता है मोती ,
क्यूँ न फिर हर बात की तह में पहुंचा जाये।

बहुत आसान है लोगो का दिल दुखाना, रुला देना ,
क्यूँ न फिर रोते हुए लोगों को हंसाया जाये।

हम पर जो नेमतें बरसीं हैं, सब उसका करम है ,
क्यूँ न फिर किसी भूखे को खाना खिलाया जाये।

कुदरत ने हमें दी है माँ के मुक़द्दस प्यार की दौलत ,
क्यूँ न फिर इस दौलत को जहाँ में लुटाया जाये।

सच्चे प्यार की कशिश में होता है जादू ऐसा ,
के दिल दे आवाज़, यार दौड़ा चला आये।

माना की ज़िन्दगी में बहुत मसरूफियत है फिर भी ,
क्यूँ न कुछ वक़्त खुद से गुफ्तगू में बिताया जाये।

कभी आसान कोई मंज़िल नहीं मिलती Read More »

Scroll to Top