My Hindi Poems

Hindi ke mukh se

 संस्कृत   की    गंगोत्री से   निकलकर
समयचक्र के   साथ खुद को ढाला है।
उर्दू से   मिलकर, मैथली ,   मारवाड़ी ,
कहीं अवधी तो कहीं भोजपुरी में ढलकर ,
सिंधी ,पंजाबी ,बांग्ला और तमाम भाषाओँ से जुड़कर ,
मैंने समस्त भारत को एक सूत्र में बांधा है।

किसी भाषा से मुझे कोई बैर नहीं ,
कोई    भाषा   मेरी    गैर     नहीं।
कोई      मौसी ,     चाची     है तो ,
कोई         सखी      सहेली     है।
कोई   पड़ोसन , कोई अतिथि तो ,
कोई   मेरी दुल्हन  नयी नवेली है।

जनगण के अधरों के स्पंदन में ,
मैं     ही    तो     बसती      हूँ।
सोच  समझ और    सपनों को ,
मैं        ही    तो     रचती    हूँ।

मम्मी, डैडी ,अंकल ,आंटी आदि ,
नित नए शब्दों को अपनाया है।
तुम्हारी सहज सरलता की खातिर ,
अपना आँचल हरदम फैलाया है।

मेरी     भी    एक अभिलाषा है , मन   में   एक आशा है,
मेरा    रूप    श्रंगार करो ,    प्रयोग करो ,    प्रसार करो ,
अधरों के स्पंदन से ,  अपने कर    कमलों तक ले आओ ,
जब भी लिखो  कुछ कागज़ पर ,मेरी लिपि ही अपनाओ।
न बांधों हिंदी दिवस के बंधन में , मुझे    हरदम याद करो ,
मुझको तो तुम बस प्यार करो , मेरी सुंदरता को संसार करो।

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