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मैं तो एक चराग़ हूँ

यह दीपावली कविता “मैं तो एक चराग़ हूँ” सभी को उजाला और उम्मीद देती है।

ख़ुद को जलाकर, दुनिया तेरी रौशन करता रहूँगा,
मैं तो एक चराग़ हूँ, यूँ ही सदा जलता रहूँगा।

न शिकवा हवा से मुझे, न गिला आँधियों से,
जज़्बा-ए-रौशनी दिल में लिए, जलता रहूँगा।

कभी शम्मा बनूँ, या कभी शोला बन जाऊँ,
मक़सद मेरा उजाला है — फैलाता रहूँगा।

दीवारें रोकें, चाहे डराएँ घने साये मुझको,
अपने उजाले से हर अँधेरा चीरता रहूँगा।

जब कभी उदासी घिर आए वक़्त के अंधेरों में,
उदास आँखों में आशा की चमक भरता रहूँगा।

गर कभी घिर जाओ तुम उजालों से अंधेरों में ,
तेरे अंधेरों का निगेहबान बन डटता रहूँगा।

तेरी खामोश नज़रों में जो हल्की-सी चमक है,
मेरा ही अक्स है — इसी गुमाँ में जीता रहूँगा।

तू साथ दे या फिर किनारा कर ले मुझसे,
तेरी राहों में सदा रौशनी करता रहूँगा।

तेरी मुस्कराहट पर मेरी रौशनी भी शर्माए ,
तेरी मुस्कराहट का तलबगार बनता रहूँगा।

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इश्क़

यूँ तो ज़माना मुझे ग़ाफ़िल समझता है,

मेरा यार मुझे मगर, क़ातिल समझता है।

 

दरिया-ए-इश्क़ में ख़ुद को फ़ना कर डाला,

मेरा दिलबर मुझे मगर, बातिल समझता है।

 

ग़ुरूर-ए-हुस्न ने मेरा दिल तोड़ा हज़ार बार,

मेरा दिल है कि उसको साहिल समझता है।

 

ग़म-ए-हयात को पीकर भी मुस्कुराता हूँ,

हर कोई मुझको बड़ा क़ाबिल समझता है।

 

मेरे जज़्बात की कीमत कहाँ समझे कोई,

हर कोई दर्द को मेरा हासिल समझता है।

 

तेरे नक्श-ए-कदम पर चला हूँ उम्रभर,

मगर तू मेरी राह को नाक़ाबिल समझता है।

 

निगाहें मेरी कभी उससे जो मिलीं चुपके,

वो तो उसे बस इक मुक़ातिल समझता है।

 

वो जो अश्कों से रूह को सींचा मैंने,

क्यूँ नहीं इस बात को वो आक़िल समझता है।

 

ख़ामोशी अब तेरी दास्ताँ बन गयी ए ‘इश्क़ ‘,

वो क्या समझे, जो ये दिल-ए-आदिल समझता है।

 

बातिल = झूठ, मिथ्या (False, Untrue): जो सत्य न हो।

मुक़ातिल = हत्यारा या क़त्ल करने वाला (Killer, Slayer)

आक़िल = बुद्धिमान (Intelligent),समझदार (Sensible),अक्लमंद (Wise)

‘दिल-ए-आदिल’ =न्यायप्रिय हृदय या इंसाफ़पसंद दिल (A just or fair heart)

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Shatranj शतरंज

तुम हो वज़ीर हुश्न के, जिधर चाहो, रुख कर लो,
मैं तेरी आशिकी का प्यादा हूँ, लौटने का हुनर हमको नहीं आता।

हो तेरी हर चाल में शोखी-ए-उस्तादी, इसकी बिसात पर,
हम तो बढ़ चले तेरे इश्क़ में, हारना-जीतना हमको नहीं आता।

तेरी चाहत की बाज़ी में, हमको मरना भी कबूल है,
शह और मात का है ये खेल, तेरे लिए, हमको ये हुनर नहीं आता।

अजीब खेल है ये शतरंज का, हर मोहरे की चाल मुक़र्रर है,
कुर्बान हो जाएं सब बादशाह की खातिर, ये खेल हमको समझ नहीं आता।

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