Bachpan
याद आतीं हैं मुझको, वो बचपन की बातें,
वो लम्बी दुपहरी , वो छोटी सी रातें ।
वो नानी के किस्से , वो अब्बू की ऊँगली ,
वो बिजली कड़कना , माँ के आँचल में छुपना।
मेरी बीमारियों में , माँ की आँखों में आंसू ,
वो थपकी से सुलाना , वो परियों की कहानी।
वो तितली पकड़ना , पकड़कर उड़ाना ,
छोटी छोटी बातों पर, रोना और मुस्कुराना।
वो मिटटी के घरोंदे , वो गुड़िआ की शादी ,
वो लकड़ी का घोडा , वो बच्चे बाराती।
वो घंटी की टनटन , वो बारिश की छुट्टी ,
वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी।
वो पतंगें लपकना , लड़ना झगड़ना ,
वो टीलों पे चढ़ना , गिरकर संभालना।
वो छोटा सा बस्ता , कम थीं किताबें ,
वो कैसी थी मस्ती , अनोखी थीं बातें।
अब तरक्की बहुत है , बचपन अकेला ,
दौलत की दौड़ का, अब लगता है मेला।
रौशनी की चकाचोंध में , दिल है अकेला ,
माँ-बाप के ख्यालों में , फ़िक्र का है रेला।
कैर्रिएर की टेंशन , ये दुनिया के मसले ,
ग्रेडिंग की चाहत , ये कोचिंग के लफड़े।
अब कहाँ है वो बचपन , बचपन की रवानी ,
कहाँ खो गयी वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी।
Inspired by Ghazal “वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी” by Jagjit Singhji
