My Nazm

Bachpan

याद आतीं हैं मुझको, वो बचपन की बातें,
वो    लम्बी   दुपहरी ,    वो छोटी सी रातें ।

वो नानी के किस्से ,        वो अब्बू की ऊँगली ,
वो बिजली कड़कना , माँ के आँचल में छुपना।

मेरी      बीमारियों में ,     माँ की आँखों    में आंसू ,
वो  थपकी से सुलाना ,   वो  परियों की कहानी।

वो       तितली    पकड़ना ,   पकड़कर उड़ाना ,
छोटी   छोटी बातों    पर, रोना और मुस्कुराना।

वो      मिटटी के    घरोंदे , वो गुड़िआ की शादी ,
वो      लकड़ी    का    घोडा ,    वो बच्चे बाराती।

वो     घंटी      की टनटन , वो    बारिश की छुट्टी ,
वो      कागज़   की कश्ती , वो   बारिश का पानी।

वो     पतंगें      लपकना ,       लड़ना    झगड़ना ,
वो        टीलों     पे चढ़ना ,      गिरकर संभालना।

वो        छोटा      सा बस्ता ,     कम थीं    किताबें ,
वो     कैसी     थी      मस्ती ,     अनोखी थीं    बातें।

अब      तरक्की       बहुत है ,      बचपन    अकेला ,
दौलत         की    दौड़ का, अब     लगता है    मेला।

रौशनी      की    चकाचोंध में ,   दिल    है      अकेला ,
माँ-बाप          के ख्यालों   में ,   फ़िक्र का    है   रेला।

कैर्रिएर         की     टेंशन ,       ये     दुनिया के मसले ,
ग्रेडिंग         की      चाहत ,     ये     कोचिंग  के लफड़े।

अब         कहाँ     है वो    बचपन ,     बचपन की रवानी ,
कहाँ खो गयी वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी।

Inspired by Ghazal   “वो  कागज़   की कश्ती , वो  बारिश का पानी”  by Jagjit Singhji

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