Vriddhashram
वृद्धाश्रम
(एक कहानी)
अध्याय -1
साकेत और उसकी पत्नी अन्विता उस दिन कहीं जाने के इरादे से नहीं निकले थे। बस यूँ ही, रविवार की दोपहर थी। शहर की भागदौड़ से ऊबे मन को थोड़ी शांति चाहिए थी। कार अपने आप शहर के बाहरी हिस्से की ओर मुड़ गई, वहीं, एक बोर्ड पर लिखा था;
“शांतिवन वृद्धाश्रम”
अन्विता ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,
“रुकें क्या? बस पाँच मिनट…”
साकेत ने बिना कुछ कहे ब्रेक लगा दिए।
कार से उतरकर दोनों शांतिवन में प्रवेश कर जाते है। आँगन में कुछ बुज़ुर्ग धूप में बैठे थे।कोई अख़बार देख रहा था, कोई आसमान, जैसे दोनों में से किसी में भी कोई ख़ास ख़बर नहीं बची हो।
वहीं एक कोने में बैठे एक बुजुर्ग से साकेत ने अभिवादन किया। उनके सफ़ेद बाल, सलीके से पहना कुर्ता, आँखों में एक ठहरी हुई गरिमा देखकर साकेत चकित था ।
बातों-बातों में पता चला उनका नाम रघुनाथ वर्मा था । वे कभी बड़े पद पर थे।तीन बेटे,
एक अमेरिका में, एक मुंबई में, एक दिल्ली में।
अन्विता ने संकोच से पूछा,
“आपके बेटे… कभी मिलने आते हैं?”
रघुनाथ वर्मा ने हल्की-सी हँसी हँसी,
वह हँसी जो चेहरे पर थी, आँखों तक पहुँचते-पहुँचते थक गई।
“मिलने?”
उन्होंने शब्द को जैसे तौलकर रखा।
“अब मिलने का ज़माना नहीं रहा बेटी।
अब तो वीडियो कॉल होती है…
और महीने की पहली तारीख़ को बैंक का मैसेज।”
साकेत चुप रहा।
रघुनाथ जी ने आगे कहा,
“बुढ़ापे में आदमी क्या चाहता है?
एक कुर्सी, जिस पर बैठकर कोई पूछ ले,
‘थक तो नहीं गए?’
पर आजकल पूछना भी एक एक्स्ट्रा सर्विस हो गई है।”
फिर धीमे से जोड़ा,
“मेरे बच्चों ने मुझे छोड़ा नहीं…
उन्होंने मुझे मैनेज कर दिया है।”
यह शब्द “मैनेज” साकेत के भीतर देर तक गूंजता रहा।
कुछ देर उनसे बतियाने के बाद वे लोग आगे बड़े । अगले कमरे में सरला देवी थीं।पतली-सी, शांत, हाथ में हमेशा एक काग़ज़। वे हर दिन कुछ लिखती थीं।
अन्विता ने धीरे से पूछा—
“आप रोज़ लिखती हैं… जवाब कभी आता है?”
सरला देवी ने काग़ज़ पर पेन रोक दिया।कुछ पल बाद बोलीं,
“जवाब नहीं आता, पर लिखने से लगता है कि मैं अभी ज़िंदा हूँ।”
अन्विता ने हिम्मत करके कहा,
“आपको कभी ग़ुस्सा नहीं आता?”
सरला देवी ने मुस्कुरा कर कहा
“ग़ुस्सा भी तभी आता है जब सामने वाला आपको अपना समझता हो।
माँ को तो बस डर लगता है। कहीं उसकी खामोशी बेटे को भारी न पड़ जाए।”
अलमारी से चिट्ठियाँ निकालते हुए उन्होंने कहा,
“हर चिट्ठी में मैं पहले माफ़ी माँग लेती हूँ,ताकि अगर वो कभी पढ़े,
तो उसे लगे कि माँ आज भी उसे हल्का करना चाहती है।”
अन्विता की आँखें भर आईं,
पर सरला देवी की आँखें सूखी थीं, शायद बहुत पहले रोना छोड़ चुकी थीं।
इसी तरह वे लोग और लोगों से मिलते रहे और उनसे बात करते रहे । शाम के 6:30 हो गए और अब डिनर का टाइम था ।
रात के खाने के समय हरिप्रसाद और शांता मिले। दोनों साथ बैठे थे, पर जैसे वर्षों से कुछ कह नहीं रहे हों। हरिप्रसाद ने थाली की ओर देखते हुए कहा,
“जब रोज़ कोई ये जताए कि आपकी वजह से उसकी ज़िंदगी रुकी हुई है,
तो एक दिन आदमी खुद चल पड़ता है।”
शांता ने बहुत धीमे से जोड़ा, हमसे कहा जाता था,
‘आप लोगों को आराम चाहिए।’
असल में उन्हें हमसे राहत चाहिए थी।”
अन्विता ने पूछा,
“आपको दुख नहीं हुआ?”
हरिप्रसाद बोले,
“दुख तब होता है जब कोई छोड़ता है।
यहाँ तो हमें रोज़ एहसास कराया गया कि हमें घर छोड़ देना ही बेहतर है।
वृद्धाश्रम से सटा एक छोटा-सा अनाथालय था।वहाँ बच्चे खेल रहे थे। साकेत और अन्विता चुपचाप वह जा कर बच्चों को देखने लगे । सरला देवी एक बच्चे अमन को कहानी सुना रही थीं। अमन ने पूछा,
“दादी, आप मेरी असली दादी हो?”
सरला देवी मुस्कुराईं, “नहीं।”
“फिर भी आप रोज़ आती हो?”
“क्योंकि तू सवाल नहीं करता कि मैं क्यों आई।”
अमन ने फिर पूछा,
“दादी, फिर आप किसकी हो?”
सरला देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा,
“आज की हूँ।कल का कौन होता है, बेटा?”
साकेत ने देखा, जिस माँ को अपने बेटे ने छोड़ दिया,वही माँ किसी अनजान बच्चे के लिए
पूरा वर्तमान बन गई थी।
रात के तकरीबन 10 बजे वे लोग वहाँ से रवाना हुए । वापसी में कार शांत थी।शहर की लाइटें पास आती जा रही थीं।
अन्विता ने अचानक पूछा,
“अगर कल हमारा बेटा हमें यहाँ छोड़ आए…?”
साकेत ने जवाब नहीं दिया।बस स्टेयरिंग कसकर पकड़ी।
उसे लगा वृद्धाश्रम केवल एक जगह नहीं,भविष्य का आईना है।
अध्याय -2
रघुनाथ वर्मा का घर किसी भी मायने में छोटा नहीं था।तीन बेडरूम, मॉड्यूलर किचन, दीवारों पर फ्रेम्ड फ़ोटोग्राफ़।
हर फ़ोटो में मुस्कान थी,
पर कोई भी मुस्कान जीवित नहीं लगती थी।
ड्रॉइंग रूम में बैठा था उनका बड़ा बेटा , अमित वर्मा।
लैपटॉप खुला था,पर स्क्रीन पर वही स्लाइड देर से टिकी हुई थी।
उसके कानों में पत्नी नेहा की आवाज़ पड़ रही थी,
जो किचन से आ रही थी।
“मैंने पहले ही कहा था अमित,
ऑफ़िस से लौटकर मुझे ये सब नहीं सुनना।
आपके पापा का यहाँ रहना हमारी पूरी लाइफ़ डिस्टर्ब कर रहा था।”
अमित ने कुछ नहीं कहा।उसने बस सिर हिला दिया।
वह सिर जो दफ़्तर में फैसले लेता था, घर में सिर्फ़ सहमति देता था।
कुछ छड़ बाद नेहा ड्रॉइंग रूम में आई। हाथ में फ़ोन था।
“अमेरिका वाले भैया का मैसेज आया है।
पूछ रहे हैं, “पापा ठीक से सेटल हो गए ना?”
अमित ने जल्दी से कहा,
“हाँ… बहुत अच्छे से।
शांतिवन में सब सुविधाएँ हैं।”
नेहा ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा,
“तो ठीक है न । अब वो भी शांति से रहेंगे और हम लोग भी अब अपनी मन मर्जी से यहाँ रह सकते है । अमित , आपने ये बहुत अच्छा फैसला लिया है ।
अमित नेहा का मुंह ताकता रह गया । मन में सोच मेरा फैसला ?
अमित ने धीमे से कहा,
“नेहा… कभी-कभी मुझे लगता है, हमने शायद…”
नेहा ने उसकी बात काट दी।
“शायद क्या?
आप चाहते थे कि मैं रोज़ अपने सास-ससुर की देखभाल करूँ?
मैं भी नौकरी करती हूँ अमित।
मेरी भी ज़िंदगी है।”
अमित चुप हो गया। उसे मालूम था,
और कुछ बोलेगा तो घर में शांति नहीं बचेगी।
और शांति उसके लिए सच से ज़्यादा ज़रूरी हो चुकी थी।
उसी समय दूसरे कमरे से एक आवाज़ आई,
“पापा…”
आरव, उनका आठ साल का बेटा,
खिलौनों के बीच अकेला बैठा था।
पास में मेड बैठी थी, मोबाइल पर व्यस्त।
आरव ने पूछा, “दादाजी कब आएँगे?”
अमित का गला सूख गया।
“वो… अभी व्यस्त हैं बेटा।”
आरव बोला,
“पहले दादाजी रोज़ मुझे कहानी सुनाते थे।
मम्मी-पापा को तो टाइम ही नहीं होता।”
यह वाक्य किसी शिकायत की तरह नहीं, साधारण सच्चाई की तरह था।
नेहा ने झुँझलाकर कहा,
“अब तुम बड़े हो रहे हो आरव।
ये सब कहानियाँ-वहानियाँ बचपना है।”
आरव ने मासूमियत से पूछा,
“तो फिर दादाजी भी बचपने वाले थे?”
कमरे में एक पल को अजीब-सी ख़ामोशी छा गई।
रात को बिस्तर पर नेहा ने कहा, “देखो अमित, मुझे मालूम है आपको ममी पापा को वहाँ छोड़ना अच्छा नहीं लगा । पर सोचो हमारी भी तो अपनी लाइफ है , प्राइवसी चाहिए । और उनको अब इस बुडापे में आराम और जुरुरत की चीजों के अलावा क्या चाहिए । ऊपर से वहाँ उनको अपनी उम्र के लोग भी मिल जाएंगे बात करने के लिए । ये हम सब के लिए विन विन सिचूऐशन है ।
अमित छत की ओर घूरता रहा । नेहा ने करवट बदल ली।सच वहीं दब गया, तकिए के नीचे।
अगले दिन सुबह आरव दादाजी की पुरानी तस्वीर लेकर बैठा था।
उसे यूं तस्वीर लेके बैठा देखकर मेड से रहा नहीं गया और बोली ,
“अब दादाजी यहाँ नहीं रहेंगे…
वहाँ सब उनका ध्यान रखते हैं…”
आरव ने अचंभे से पूछा कहाँ ?
“ वही, जहां उनकी उम्र के और बहुत लोग रहते हैं”।
आरव बहुत देर तक चुप रहा और फिर धीरे से बोला ,
“सोच रहा हूँ, जब मैं बड़ा हो जाऊँगा,
तो क्या मुझे भी किसी को ऐसी तस्वीर में बंद कर देना पड़ेगा?”
यह सवाल घर की दीवारों में कहीं अटक कर रह गया। मेड की आँखें भी नम हो आईं ।
अध्याय–3
घर साफ़ था,
होटल के कमरे जैसा ।
इतना साफ़ कि उसमें किसी की
ज़रूरत महसूस नहीं होती थी।
डाइनिंग टेबल पर
सरला देवी की चिट्ठी रखी थी।
खुली हुई।
संदीप उसे पढ़ चुका था।
एक बार नहीं, तीन बार।
“बेटा,
मैं ठीक हूँ। यहाँ सब लोग अच्छे हैं।
अगर मेरी वजह से कभी तुम्हें
थकान या परेशानी हुई हो,
तो मुझे माफ़ कर देना।
माँ”
कोई शिकायत नहीं।
कोई इल्ज़ाम नहीं।
बस एक माँ, खुद को छोटा करती हुई।
पूजा ने चाय रखते हुए पूछा,
“पढ़ ली?”
संदीप ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“क्या लिखा है?”
“कुछ नहीं…
वही सब।”
“वही सब क्या?”
संदीप ने शब्द खोजते हुए कहा,
“यही कि वो ठीक हैं।
और… माफ़ी।”
पूजा ने राहत की साँस ली।
“तो ठीक है ना।मतलब उन्हें कोई शिकायत नहीं।”
संदीप कुछ बोलते-बोलते रुक गया।
“पूजा…”
उसने धीमे से कहा,
“माँ को सच में हमारी ज़रूरत है।”
पूजा ने बिना चौंके कहा,
“संदीप, हर किसी को किसी न किसी की ज़रूरत होती है।
इसका मतलब ये नहीं कि हम अपनी ज़िंदगी रोक दें।”
“पर वो अकेली हैं…”
“वो वहाँ अकेली नहीं हैं।
वहाँ उनके जैसे और लोग हैं।
वहाँ उनका ध्यान रखा जाता है।”
फिर उसने धीरे से जोड़ा,
“और सबसे बड़ी बात, वहाँ वो सुरक्षित हैं।”
कुछ देर के लिए मौन छा गया । “सुरक्षित” शब्द ने आगे वार्तालाप को सिकोड़ दिया था ।
कुछ देर बाद पूजा फिर बोली ,
“उस कमरे का क्या करना है?”
“किस कमरे का?”
“माँ के कमरे का। इतनी जगह यूँ ही बंद पड़ी है।”
संदीप बोला,
“थोड़ा समय दे दो।”
पूजा ने कहा,
“समय किसे? उन्हें या खुद को?”
यह सवाल बहुत साधारण था, पर उसका जवाब कठिन।
पूजा ने निर्णयात्मक लहजे में कहा , में उस कमरे को स्टोर रूम बना लेती हूँ । वैसे भी हमारे घर मे कोई स्टोर रूम नहीं है ।
रात को चिट्ठी फाइल में रख दी गई,
सर्टिफ़िकेट्स, इंश्योरेंस पेपर्स, और दूसरे ज़रूरी काग़ज़ों के बीच।
माँ अब एक दस्तावेज़ बन चुकी थी।
अध्याय–4
हरिप्रसाद का घर अब भी वही था,
दीवारें वही, फर्श वही,
बस आवाज़ें बदल गई थीं।
दरअसल, आवाज़ें थीं ही नहीं।
ड्रॉइंग रूम में बैठी थी बहू, कविता।
टीवी चल रहा था।
किसी सीरियल में कोई रो रहा था,
पर कमरे में कोई भाव नहीं था।
उनका बेटा रमेश लैपटॉप पर झुका हुआ था।
ऑफ़िस का काम घर तक फैला हुआ था।
कविता ने चाय रखते हुए कहा,
“अच्छा हुआ, अब घर थोड़ा खुला-खुला लग रहा है।”
रमेश ने सिर उठाए बिना कहा—
“हाँ…
कम से कम अब हर बात समझानी नहीं पड़ती।”
कविता बोली,
“आपको याद है,
माँ कैसे हर चीज़ में टोकती रहती थीं?”
रमेश बोला,
“कविता, वो दिल की बुरी नहीं हैं,
बस आदत से मजबूर थीं।”
“आदत?”
कविता हल्की हँसी हँसी।
“सुबह उठते ही पूछना,
‘बहू, नाश्ता कब बनेगा? आज क्या बनाओगी?’
मुझे तो लगता था जैसे
मैं उनके शेड्यूल पर चल रही हूँ।”
वह बोलती चली गई,
“तुम्हें याद है,
माँ कितनी टोका-टोकी करती रहती थीं?
‘बहू, सब्ज़ी जल जाएगी।’
‘दाल में छौंक लगा दो।’
मैंने एक दिन थोड़ा ज़ोर से जवाब दे दिया,
‘माँ, मैं देख लूँगी।
आप इतना टोका-टोकी मत किया करें।’
बस…
आपकी माँ को बुरा लग गया।
मुझसे बात करना तक बंद कर दिया।
और पापा भी मुझे उल्टा समझाने लगे कि माँ बस मेरी मदद करना चाहती है।”
कविता की आवाज़ में अब सफ़ाई थी, शिकायत नहीं।
“मैंने भी कह दिया था,
‘मदद और दख़ल में फ़र्क होता है, पापा।’”
उस दिन के बाद से
घर में कुछ बदला नहीं था,बस सब चुप हो गए थे।
कविता ने आगे कहा,
“आपके पापा तो फिर भी ठीक थे।
माँ…हर बात दिल पर ले लेती थीं।”
रमेश ने कुर्सी पीछे खिसकाई।
“कविता, वो दिल की बुरी नहीं हैं।”
कविता ने सीधे कहा,
“तो आप कहना क्या चाहते हैं?
सारी गलती मेरी है? मैं ही जल्लाद हूँ?”
रमेश ने कुछ नहीं कहा।
कविता ने बिना रुके जोड़ दिया,
“कम से कम अब घर में शांति है।”
घर में सचमुच शांति थी।
इतनी शांति कि दीवारें भी कुछ कहने से डरती थीं।
थोड़ी देर बाद कविता ने धीमे स्वर में कहा,
“आपको पता है रमेश,मैं बुरी बहू नहीं बनना चाहती थी।
पर हर दिन खुद को समझाना पड़ता था कि मैं गलत नहीं हूँ।”
रमेश ने थकी आवाज़ में कहा,
“और पापा-माँ हर दिन खुद को समझाते रहे कि वो ज़रूरत से ज़्यादा बोल रहे हैं।”
कविता पलटकर बोली,
“तो क्या उन्हें चुप रहना नहीं चाहिए था?
क्या हर बदलाव की कीमत हमें ही चुकानी होती है?”
रमेश कुछ पल खामोश रहा।
फिर बोला,
“कभी-कभी लगता है हमने उन्हें बदला नहीं,
बस धीरे-धीरे मिटा दिया।”
कविता ने तुरंत कहा,
“इतना भी मत सोचिए। उन्होंने खुद जाना चुना।”
रमेश ने बहुत धीमे से कहा,
“हाँ…
पर चुनने के लिए
कितने विकल्प छोड़े थे हमने?”
कविता ने कमरे की ओर देखते हुए कहा,
“अब देखिए,
कोई टोका-टोकी नहीं,
कोई सवाल नहीं।
सब अपनी जगह।”
रमेश बोला,
“हाँ, सब अपनी जगह है…
बस इंसान नहीं।”
कविता ने बात टालते हुए कहा,
“आप हर बात को भावुक बना देते हैं।”
रमेश ने पहली बार थोड़ा तेज़ कहा,
“और तुम हर भावना को असुविधा समझ लेती हो।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
टीवी पर कोई रो रहा था,
पर इस घर में अब रोना भीग़ैर-ज़रूरी हो चुका था।
रमेश को याद आया,
पापा अख़बार पढ़ते हुए बीच-बीच में कोई टिप्पणी करते थे।
माँ पूजा के समय धीमे-धीमे भजन गुनगुनाती थीं।
अब…
सब कुछ व्यवस्थित था।
पर निष्प्राण।
अगले दिन
कविता अलमारी साफ़ कर रही थी।
एक साड़ी हाथ में लेकर बोली,
“पापा-मम्मी के कपड़े
किसे दे दें?”
रमेश ने कहा,
“जैसा ठीक लगे।”
“मतलब?”
“मतलब…
अब तो वो यहाँ रहने वाले नहीं हैं।”
कविता ने साड़ी को देखा।
“माँ की ये साड़ी
किसी गरीब को दे देते हैं।”
रमेश बोला—
“उन्हें ये साड़ी पसंद थी।”
कविता ने कहा,
“पसंद बहुत कुछ होता है रमेश।
हर पसंद संभाल कर तो नहीं रख सकते।”
रमेश ने साड़ी को हाथ में लिया
और धीरे धीरे उसे सहलाने लगा , उसे माँ के स्पर्श का आभास हो रहा था । उसकी आँखें नम आईं ।
रात को रमेश अकेला बैठा था।
उसे याद आया,
पापा ने जाते समय कहा था,
“बेटा, हमने खुद फैसला लिया है।”
उस वक़्त उसे यह बात समझदारी लगी थी।
पर आज उसे यह बात अपनी हार लग रही थी।
उसने पहली बार साफ़-साफ़ सोचा,
“हमने उन्हें घर से नहीं निकाला।
बस उन्हें यह महसूस करा दिया
कि यह घर अब उनका नहीं रहा।”
अध्याय-5
क्लब में नए साल की रात थी।
रोशनी ज़्यादा थी,
आवाज़ें ऊँची,
और सब कुछ इतना चमकीला कि कोई किसी के भीतर झाँकने की कोशिश न करे।
साकेत और अन्विता भीड़ का हिस्सा थे।
डांस फ़्लोर पर लोग खुश होने की पूरी कोशिश कर रहे थे।
अन्विता ने हँसते हुए कहा,
“कम से कम यहाँ कोई गंभीर बात नहीं करेगा।”
साकेत मुस्कुराया। “नया साल है… पुराने सवाल आज छुट्टी पर होंगे।”
डिनर अनाउंस हुआ।
संयोग से
आठ–दस लोग
एक ही बड़ी गोल मेज़ पर बैठ गए।
कोई किसी को पहले से नहीं जानता था।
बस वही औपचारिक मुस्कानें,
वही ‘हाय–हेलो’।
“मैं अमित,”
एक आदमी ने कहा,
“आईटी में हूँ।”
“संदीप,”
दूसरा बोला,
“मार्केटिंग।”
“रमेश,”
तीसरा,
“ऑपरेशन्स।”
परिचय हल्का था,
जैसे होना चाहिए।
खाना आने में समय था।
बातें अपने आप काम से बच्चों तक पहुँच गईं।
अमित ने कहा,
“आजकल बच्चों के पास टाइम ही नहीं होता।
हम तो बस चाहते हैं कि वो अपने पैरों पर खड़े हों।”
संदीप हँसा,
“और जब खड़े हो जाते हैं तो हमें बैठा देते हैं।”
सब औपचारिक हंसी हँसे ।
अन्विता ने पूछा,
“आपके बच्चे क्या कर रहे हैं?”
रमेश बोला,
“एक ही बेटा है।
स्कूल में है।
हम दोनों काम करते हैं, तो ज़्यादातर मैड के साथ रहता है।”
अन्विता ने पूछा ,
“क्यों , घर में और कोई नहीं है , मेरा मतलब आपके पेरेंट्स”
रमेश बिना नजरें मिलाए बोला,
“दोनों है, साथ हैं। पर हमारे साथ नहीं रहते। उन्होंने अपनी उम्र के लोगों के साथ रहना पसंद किया । उन्होंने खुद कहा था, अब हमें बच्चों के बीच नहीं पड़ना।”
नेहा (अमित की पत्नी) बोली—
“हमारे माँ-बाप के ज़माने में अलग तरह की ज़िंदगी थी। और आज की ज़िंदगी भी कम मुश्किल नहीं है। हर चीज़ को बैलेंस करना पड़ता है।”
साकेत ने यूँ ही पूछा—
“आपके माता-पिता कहाँ रहते हैं?”
अमित ने कहा,
“पापा अब…एक जगह रहते हैं जहाँ उनकी पूरी देखभाल होती है।”
अन्विता ने पूछा,
“ओह…कस्बे में?”
नेहा ने तुरंत संभाल लिया,
“नहीं, शहर के बाहर। काफ़ी शांत जगह है।”
कोई नाम नहीं लिया गया।
संदीप ने भी कहा,
“ हाँ , वर्किंग कपल के साथ पेरेंट्स बोर हो जाते है , कोई बात करने को भी नहीं मिलता”।
उसने जोड़ा ,
“आजकल…सबको अपनी उम्र के लोग ज़्यादा समझते हैं”।
मेज़ पर
कुछ सेकंड के लिए
कोई नहीं बोला।
फिर किसी ने कहा,
“आजकल ये सब काफ़ी नॉर्मल हो गया है।”
सबने सिर हिला दिया।
नॉर्मल शब्द सबसे आरामदेह था।
साकेत ने खाना छुआ तक नहीं।
उसे अचानक शांतिवन की कुर्सियाँ पर बैठी आकीर्तियां याद आईं,
धूप में बैठी,खामोश।
उसने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि यहाँ कहने को और कुछ था भी नहीं ।
खाना खत्म हुआ।
लोग उठे,
हाथ मिलाए।
“मिलकर अच्छा लगा।”
“हैप्पी न्यू ईयर!”
लॉन में आतिशबाज़ी शुरू हो चुकी थी।
साकेत और अन्विता चुपचाप क्लब से निकालकर अपने घर की ओर चल दिया । रास्ते भर कार में एक अजीब स सन्नाटा पसरा रहा ।
अध्याय-6
शांतिवन उस दिन भी वैसा ही था,
वही आँगन, वही धूप,
वही कुर्सियाँ।
बस एक कुर्सी खाली थी।
साकेत और अन्विता कुछ दिनों बाद फिर वहाँ आए थे।
इस बार किसी वजह से नहीं, बस मन नहीं माना था।
अन्विता ने आँगन में नज़र घुमाई।
“आज भी सब लोग वहीं बैठते हैं,”
उसने धीमे से कहा।
साकेत ने सिर हिलाया।
फिर उसकी नज़र उस खाली कुर्सी पर टिक गई।
वह कुर्सी
दूसरों जैसी ही थी,
लकड़ी की, थोड़ी घिसी हुई,
पर आज
कुछ अलग लग रही थी।
केयरटेकर पास से गुज़रा।
साकेत ने यूँ ही पूछा,
“आज कोई कम लग रहा हैं?”
उसने रुककर कहा,
“कल रात एक बुज़ुर्ग चले गए।”
अन्विता ने अनजाने में पूछा,
“उनके…?”
केयरटेकर समझ गया।
“हाँ, बच्चे थे। कह रहे थे आज आने वाले हैं।”
उसने वाक्य पूरा नहीं किया। ज़रूरत भी नहीं थी।
साकेत ने पूछा नहीं, कौन थे।
किसके पिता।
किसकी माँ।
उसकी आँखों के सामने
सिर्फ़ एक तस्वीर थी,
एक आदमी या एक औरत,
जो शायद कल तक यहीं बैठा होगा,
धूप में, किसी इंतज़ार के साथ।
अन्विता उस कुर्सी के पास जाकर खड़ी हो गई।
हाथ से कुर्सी की पीठ थपथपाई, जैसे कोई वहाँ अब भी बैठा हो।
“अजीब है,”
उसने कहा,
“इतनी भीड़ में एक खाली कुर्सी कितनी ज़्यादा दिखती है।”
साकेत कुछ नहीं बोला। उस खाली कुर्सी में साकेत को अपने पिता की कुर्सी दिखी,
वह कुर्सी जो उनके घर में बरामदे में रखी रहती थी।
उसे याद आया, पिता कहते थे,
“धूप अच्छी लगती है इस उम्र में।”
शांतिवन में कोई शोर नहीं था।
कोई रोना नहीं।
कोई शिकायत नहीं।
सब कुछ उतना ही शांत था
जितना होना चाहिए था।
बस एक जगह खाली थी।
शांतिवन से निकलते हुए साकेत ने जेब से फोन निकाला।
कुछ पल स्क्रीन को देखता रहा।
फिर कॉल मिलाई।
उधर दो रिंग के बाद आवाज़ आई,
“हाँ बेटा।”
साकेत ने एक पल को आँखें बंद कर लीं।
“पापा… मैं यूँ ही फोन कर रहा था।”
“सब ठीक है?”
पिता की आवाज़ में कोई घबराहट नहीं थी,
बस सहज जिज्ञासा।
“हाँ… सब ठीक है।”
दूसरी तरफ़ से हल्की-सी खाँसी सुनाई दी।
फिर पिता बोले—
“माँ पास में बैठी है। चाय पी रहे हैं।”
साकेत ने कहा,
“अच्छा है। धूप में बैठा कीजिएगा।”
“हाँ बेटा,”
पिता मुस्कुराए होंगे साकेत को यक़ीन था।
फोन कट गया।
साकेत ने फोन नीचे किया।
अन्विता चुपचाप उसके पास खड़ी थी।
“कुछ कहा?” उसने पूछा।
साकेत ने सिर हिलाया।
“नहीं… बस सुना।”
कुछ रिश्तों को बचाने के लिए बहुत कुछ कहने की ज़रूरत नहीं होती बस
समय रहते आवाज़ सुन लेना काफ़ी होता है।
यह कहानी किसी एक परिवार की नहीं है।
यह उन सवालों की है,
जो हम सब समय से पहले टाल देते हैं
