Vriddhashram

वृद्धाश्रम

(एक कहानी)

अध्याय -1

साकेत और उसकी पत्नी अन्विता उस दिन कहीं जाने के इरादे से नहीं निकले थे। बस यूँ ही, रविवार की दोपहर थी। शहर की भागदौड़ से ऊबे मन को थोड़ी शांति चाहिए थी। कार अपने आप शहर के बाहरी हिस्से की ओर मुड़ गई, वहीं, एक बोर्ड पर लिखा था;

शांतिवन वृद्धाश्रम”

अन्विता ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,
“रुकें क्या? बस पाँच मिनट…”

साकेत ने बिना कुछ कहे ब्रेक लगा दिए।

कार से उतरकर दोनों शांतिवन में प्रवेश कर जाते है। आँगन में कुछ बुज़ुर्ग धूप में बैठे थे।कोई अख़बार देख रहा था, कोई आसमान, जैसे दोनों में से किसी में भी कोई ख़ास ख़बर नहीं बची हो।

वहीं एक कोने में बैठे  एक बुजुर्ग  से साकेत ने अभिवादन किया।  उनके सफ़ेद बाल, सलीके से पहना कुर्ता, आँखों में एक ठहरी हुई गरिमा देखकर साकेत चकित था ।

बातों-बातों में पता चला उनका नाम रघुनाथ वर्मा था । वे कभी बड़े पद पर थे।तीन बेटे,
एक अमेरिका में, एक मुंबई में, एक दिल्ली में।

अन्विता ने संकोच से पूछा,
“आपके बेटे… कभी मिलने आते हैं?”

रघुनाथ वर्मा ने हल्की-सी हँसी हँसी,
वह हँसी जो चेहरे पर थी, आँखों तक पहुँचते-पहुँचते थक गई।

“मिलने?”
उन्होंने शब्द को जैसे तौलकर रखा।
“अब मिलने का ज़माना नहीं रहा बेटी।
अब तो वीडियो कॉल होती है…
और महीने की पहली तारीख़ को बैंक का मैसेज।”

साकेत चुप रहा।

रघुनाथ जी ने आगे कहा,
“बुढ़ापे में आदमी क्या चाहता है?
एक कुर्सी, जिस पर बैठकर कोई पूछ ले,
‘थक तो नहीं गए?’
पर आजकल पूछना भी एक एक्स्ट्रा सर्विस हो गई है।”

फिर धीमे से जोड़ा,
“मेरे बच्चों ने मुझे छोड़ा नहीं…
उन्होंने मुझे मैनेज कर दिया है।”

यह शब्द “मैनेजसाकेत के भीतर देर तक गूंजता रहा।

कुछ देर उनसे बतियाने के बाद वे लोग आगे बड़े । अगले कमरे में सरला देवी थीं।पतली-सी, शांत, हाथ में हमेशा एक काग़ज़। वे हर दिन कुछ लिखती थीं।

अन्विता ने धीरे से पूछा—
“आप रोज़ लिखती हैं… जवाब कभी आता है?”

सरला देवी ने काग़ज़ पर पेन रोक दिया।कुछ पल बाद बोलीं,
“जवाब नहीं आता, पर लिखने से लगता है कि मैं अभी ज़िंदा हूँ।”

अन्विता ने हिम्मत करके कहा,
“आपको कभी ग़ुस्सा नहीं आता?”

सरला देवी ने मुस्कुरा कर कहा 

“ग़ुस्सा भी तभी आता है जब सामने वाला आपको अपना समझता हो।
माँ को तो बस डर लगता है। कहीं उसकी खामोशी बेटे को भारी न पड़ जाए।”

अलमारी से चिट्ठियाँ निकालते हुए उन्होंने कहा,
“हर चिट्ठी में मैं पहले माफ़ी माँग लेती हूँ,ताकि अगर वो कभी पढ़े,
तो उसे लगे कि माँ आज भी उसे हल्का करना चाहती है।”

अन्विता की आँखें भर आईं,
पर सरला देवी की आँखें सूखी थीं, शायद बहुत पहले रोना छोड़ चुकी थीं।

इसी तरह वे लोग और लोगों से मिलते रहे और उनसे बात करते रहे । शाम के 6:30 हो गए और अब डिनर का टाइम था ।

रात के खाने के समय हरिप्रसाद और शांता मिले। दोनों साथ बैठे थे, पर जैसे वर्षों से कुछ कह नहीं रहे हों। हरिप्रसाद ने थाली की ओर देखते हुए कहा,
“जब रोज़ कोई ये जताए कि आपकी वजह से उसकी ज़िंदगी रुकी हुई है,
तो एक दिन आदमी खुद चल पड़ता है।”

शांता ने बहुत धीमे से जोड़ा, हमसे कहा जाता था,
‘आप लोगों को आराम चाहिए।’
असल में उन्हें हमसे राहत चाहिए थी।”

अन्विता ने पूछा,
“आपको दुख नहीं हुआ?”

हरिप्रसाद बोले,
“दुख तब होता है जब कोई छोड़ता है।
यहाँ तो हमें रोज़ एहसास कराया गया कि हमें घर छोड़ देना ही बेहतर है।

वृद्धाश्रम से सटा एक छोटा-सा अनाथालय था।वहाँ बच्चे खेल रहे थे। साकेत और अन्विता चुपचाप वह जा कर बच्चों को देखने लगे । सरला देवी एक बच्चे अमन को कहानी सुना रही थीं। अमन ने पूछा,
“दादी, आप मेरी असली दादी हो?”

सरला देवी मुस्कुराईं, “नहीं।”

“फिर भी आप रोज़ आती हो?”

“क्योंकि तू सवाल नहीं करता कि मैं क्यों आई।”

अमन ने फिर पूछा,
“दादी, फिर आप किसकी हो?”

सरला देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा,
“आज की हूँ।कल का कौन होता है, बेटा?”

साकेत ने देखा, जिस माँ को अपने बेटे ने छोड़ दिया,वही माँ किसी अनजान बच्चे के लिए
पूरा वर्तमान बन गई थी।

रात के तकरीबन 10 बजे वे लोग वहाँ से रवाना हुए । वापसी में कार शांत थी।शहर की लाइटें पास आती जा रही थीं।

अन्विता ने अचानक पूछा,
“अगर कल हमारा बेटा हमें यहाँ छोड़ आए…?”

साकेत ने जवाब नहीं दिया।बस स्टेयरिंग कसकर पकड़ी।

उसे लगा वृद्धाश्रम केवल एक जगह नहीं,भविष्य का आईना है।

अध्याय -2

रघुनाथ वर्मा का घर किसी भी मायने में छोटा नहीं था।तीन बेडरूम, मॉड्यूलर किचन, दीवारों पर फ्रेम्ड फ़ोटोग्राफ़।
हर फ़ोटो में मुस्कान थी,
पर कोई भी मुस्कान जीवित नहीं लगती थी।

ड्रॉइंग रूम में बैठा था उनका बड़ा बेटा , अमित वर्मा।
लैपटॉप खुला था,पर स्क्रीन पर वही स्लाइड देर से टिकी हुई थी।

उसके कानों में पत्नी नेहा की आवाज़ पड़ रही थी,
जो किचन से आ रही थी।

“मैंने पहले ही कहा था अमित,
ऑफ़िस से लौटकर मुझे ये सब नहीं सुनना।
आपके पापा का यहाँ रहना हमारी पूरी लाइफ़ डिस्टर्ब कर रहा था।”

अमित ने कुछ नहीं कहा।उसने बस सिर हिला दिया।
वह सिर जो दफ़्तर में फैसले लेता था, घर में सिर्फ़ सहमति देता था।

कुछ छड़ बाद नेहा ड्रॉइंग रूम में आई। हाथ में फ़ोन था।

“अमेरिका वाले भैया का मैसेज आया है।
पूछ रहे हैं, “पापा ठीक से सेटल हो गए ना?”

अमित ने जल्दी से कहा,
“हाँ… बहुत अच्छे से।
शांतिवन में सब सुविधाएँ हैं।”

नेहा ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा,
“तो ठीक है न । अब वो भी शांति से रहेंगे और हम लोग भी अब अपनी मन मर्जी से यहाँ रह सकते है । अमित , आपने ये बहुत अच्छा फैसला लिया है ।

अमित नेहा का मुंह ताकता रह गया । मन में सोच मेरा फैसला ?

अमित ने धीमे से कहा,
“नेहा… कभी-कभी मुझे लगता है, हमने शायद…”

नेहा ने उसकी बात काट दी।
“शायद क्या?
आप चाहते थे कि मैं रोज़ अपने सास-ससुर की देखभाल करूँ?
मैं भी नौकरी करती हूँ अमित।
मेरी भी ज़िंदगी है।”

अमित चुप हो गया। उसे मालूम था,
और कुछ  बोलेगा तो घर में शांति नहीं बचेगी।
और शांति उसके लिए सच से ज़्यादा ज़रूरी हो चुकी थी।

उसी समय दूसरे कमरे से एक आवाज़ आई,
“पापा…”

आरव, उनका आठ साल का बेटा,
खिलौनों के बीच अकेला बैठा था।
पास में मेड  बैठी थी, मोबाइल पर व्यस्त।

आरव ने पूछा, “दादाजी कब आएँगे?”

अमित का गला सूख गया।

“वो… अभी व्यस्त हैं बेटा।”

आरव बोला,
“पहले दादाजी रोज़ मुझे कहानी सुनाते थे।
मम्मी-पापा को तो टाइम ही नहीं होता।”

यह वाक्य किसी शिकायत की तरह नहीं, साधारण सच्चाई की तरह था।

नेहा ने झुँझलाकर कहा,
“अब तुम बड़े हो रहे हो आरव।
ये सब कहानियाँ-वहानियाँ बचपना है।”

आरव ने मासूमियत से पूछा,
“तो फिर दादाजी भी बचपने वाले थे?”

कमरे में एक पल को अजीब-सी ख़ामोशी छा गई।

रात को बिस्तर पर नेहा ने कहा, “देखो  अमित, मुझे मालूम है आपको  ममी पापा को वहाँ छोड़ना अच्छा नहीं लगा । पर सोचो हमारी भी तो अपनी लाइफ है , प्राइवसी चाहिए । और उनको अब इस बुडापे में  आराम और जुरुरत की चीजों के अलावा क्या चाहिए । ऊपर से वहाँ उनको अपनी उम्र के लोग भी मिल  जाएंगे बात करने के लिए । ये हम सब के लिए विन  विन  सिचूऐशन है ।

अमित  छत की  ओर घूरता रहा । नेहा ने करवट बदल ली।सच वहीं दब गया, तकिए के नीचे।

अगले दिन सुबह आरव दादाजी की पुरानी तस्वीर लेकर बैठा था। 

उसे यूं तस्वीर लेके बैठा देखकर मेड से  रहा नहीं गया और बोली ,

“अब दादाजी यहाँ नहीं रहेंगे…
वहाँ सब उनका ध्यान रखते हैं…”

आरव ने अचंभे  से पूछा कहाँ ?

“ वही, जहां उनकी उम्र के और बहुत लोग रहते  हैं”।

आरव बहुत देर तक चुप रहा और फिर धीरे से बोला ,
“सोच रहा हूँ, जब मैं बड़ा हो जाऊँगा,
तो क्या मुझे भी किसी को ऐसी तस्वीर में बंद कर देना पड़ेगा?”

यह सवाल घर की दीवारों में कहीं अटक कर रह गया। मेड की आँखें भी नम हो आईं ।

अध्याय–3

घर साफ़ था,
होटल के कमरे जैसा ।
इतना साफ़ कि उसमें किसी की
ज़रूरत महसूस नहीं होती थी।

डाइनिंग टेबल पर
सरला देवी की चिट्ठी रखी थी।
खुली हुई।

संदीप उसे पढ़ चुका था।
एक बार नहीं, तीन बार।

बेटा,
मैं ठीक हूँ। यहाँ सब लोग अच्छे हैं।
अगर मेरी वजह से कभी तुम्हें
थकान या परेशानी हुई हो,
तो मुझे माफ़ कर देना।
माँ”

कोई शिकायत नहीं।
कोई इल्ज़ाम नहीं।
बस एक माँ, खुद को छोटा करती हुई।

पूजा ने चाय रखते हुए पूछा,
“पढ़ ली?”

संदीप ने सिर हिलाया।
“हाँ।”

“क्या लिखा है?”

“कुछ नहीं…
वही सब।”

“वही सब क्या?”

संदीप ने शब्द खोजते हुए कहा,
“यही कि वो ठीक हैं।
और… माफ़ी।”

पूजा ने राहत की साँस ली।
“तो ठीक है ना।मतलब उन्हें कोई शिकायत नहीं।”

संदीप कुछ बोलते-बोलते रुक गया।

“पूजा…”
उसने धीमे से कहा,
“माँ को सच में हमारी ज़रूरत है।”

पूजा ने बिना चौंके कहा,
“संदीप, हर किसी को किसी न किसी की ज़रूरत होती है।
इसका मतलब ये नहीं कि हम अपनी ज़िंदगी रोक दें।”

“पर वो अकेली हैं…”

“वो वहाँ अकेली नहीं हैं।
वहाँ उनके जैसे और लोग हैं।
वहाँ उनका ध्यान रखा जाता है।”

फिर उसने धीरे से जोड़ा,
“और सबसे बड़ी बात, वहाँ वो सुरक्षित हैं।”

कुछ देर के लिए मौन छा  गया ।  “सुरक्षित” शब्द ने आगे वार्तालाप को सिकोड़ दिया था ।

कुछ देर बाद पूजा  फिर बोली ,
“उस कमरे का क्या करना है?”

“किस कमरे का?”

“माँ के कमरे का। इतनी जगह यूँ ही बंद पड़ी है।”

संदीप बोला,
“थोड़ा समय दे दो।”

पूजा ने कहा,
“समय किसे? उन्हें या खुद को?”

यह सवाल बहुत साधारण था, पर उसका जवाब कठिन।

पूजा ने निर्णयात्मक लहजे में कहा , में उस कमरे को स्टोर रूम बना लेती हूँ । वैसे भी हमारे घर मे कोई स्टोर रूम नहीं है ।

रात को चिट्ठी फाइल में रख दी गई,
सर्टिफ़िकेट्स, इंश्योरेंस पेपर्स, और दूसरे ज़रूरी काग़ज़ों के बीच।

माँ अब एक दस्तावेज़ बन चुकी थी।

अध्याय–4

हरिप्रसाद का घर अब भी वही था,
दीवारें वही, फर्श वही,
बस आवाज़ें बदल गई थीं।
दरअसल, आवाज़ें थीं ही नहीं।

ड्रॉइंग रूम में बैठी थी बहू, कविता।
टीवी चल रहा था।
किसी सीरियल में कोई रो रहा था,
पर कमरे में कोई भाव नहीं था।

उनका बेटा रमेश लैपटॉप पर झुका हुआ था।
ऑफ़िस का काम घर तक फैला हुआ था।

कविता ने चाय रखते हुए कहा,
“अच्छा हुआ, अब घर थोड़ा खुला-खुला लग रहा है।”

रमेश ने सिर उठाए बिना कहा—
“हाँ…
कम से कम अब हर बात समझानी नहीं पड़ती।”

कविता बोली,
“आपको याद है,
माँ कैसे हर चीज़ में टोकती रहती थीं?”

रमेश बोला,
“कविता, वो दिल की बुरी नहीं हैं,
बस आदत से मजबूर थीं।”

“आदत?”
कविता हल्की हँसी हँसी।
“सुबह उठते ही पूछना,
‘बहू, नाश्ता कब बनेगा? आज क्या बनाओगी?’
मुझे तो लगता था जैसे
मैं उनके शेड्यूल पर चल रही हूँ।”

वह बोलती चली गई,
“तुम्हें याद है,
माँ कितनी टोका-टोकी करती रहती थीं?
‘बहू, सब्ज़ी जल जाएगी।’
‘दाल में छौंक लगा दो।’

मैंने एक दिन थोड़ा ज़ोर से जवाब दे दिया,
‘माँ, मैं देख लूँगी।
आप इतना टोका-टोकी मत किया करें।’

बस…
आपकी माँ को बुरा लग गया।
मुझसे बात करना तक बंद कर दिया।
और पापा भी मुझे उल्टा समझाने लगे कि माँ बस मेरी मदद करना चाहती है।”

कविता की आवाज़ में अब सफ़ाई थी, शिकायत नहीं।

“मैंने भी कह दिया था,
‘मदद और दख़ल में फ़र्क होता है, पापा।’”

उस दिन के बाद से
घर में कुछ बदला नहीं था,बस सब चुप हो गए थे।

कविता ने आगे कहा,
“आपके पापा तो फिर भी ठीक थे।
माँ…हर बात दिल पर ले लेती थीं।”

रमेश ने कुर्सी पीछे खिसकाई।
“कविता, वो दिल की बुरी नहीं हैं।”

कविता ने सीधे कहा,
“तो आप कहना क्या चाहते हैं?
सारी गलती मेरी है? मैं ही जल्लाद हूँ?”

रमेश ने कुछ नहीं कहा।

कविता ने बिना रुके जोड़ दिया,
“कम से कम अब घर में शांति है।”

घर में सचमुच शांति थी।
इतनी शांति कि दीवारें भी कुछ कहने से डरती थीं।

थोड़ी देर बाद कविता ने धीमे स्वर में कहा,
“आपको पता है रमेश,मैं बुरी बहू नहीं बनना चाहती थी।
पर हर दिन खुद को समझाना पड़ता था कि मैं गलत नहीं हूँ।”

रमेश ने थकी आवाज़ में कहा,
“और पापा-माँ हर दिन खुद को समझाते रहे कि वो ज़रूरत से ज़्यादा बोल रहे हैं।”

कविता पलटकर बोली,
“तो क्या उन्हें चुप रहना नहीं चाहिए था?
क्या हर बदलाव की कीमत हमें ही चुकानी होती है?”

रमेश कुछ पल खामोश रहा।
फिर बोला,
“कभी-कभी लगता है हमने उन्हें बदला नहीं,
बस धीरे-धीरे मिटा दिया।”

कविता ने तुरंत कहा,
“इतना भी मत सोचिए। उन्होंने खुद जाना चुना।”

रमेश ने बहुत धीमे से कहा,
“हाँ…
पर चुनने के लिए
कितने विकल्प छोड़े थे हमने?”

कविता ने कमरे की ओर देखते हुए कहा,
“अब देखिए,
कोई टोका-टोकी नहीं,
कोई सवाल नहीं।
सब अपनी जगह।”

रमेश बोला,
“हाँ, सब अपनी जगह है…
बस इंसान नहीं।”

कविता ने बात टालते हुए कहा,
“आप हर बात को भावुक बना देते हैं।”

रमेश ने पहली बार थोड़ा तेज़ कहा,
“और तुम हर भावना को असुविधा समझ लेती हो।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।
टीवी पर कोई रो रहा था,
पर इस घर में अब रोना भीग़ैर-ज़रूरी हो चुका था।

रमेश को याद आया,
पापा अख़बार पढ़ते हुए बीच-बीच में कोई टिप्पणी करते थे।
माँ पूजा के समय धीमे-धीमे भजन गुनगुनाती थीं।

अब…
सब कुछ व्यवस्थित था।
पर निष्प्राण।

अगले दिन
कविता अलमारी साफ़ कर रही थी।
एक साड़ी हाथ में लेकर बोली,
“पापा-मम्मी के कपड़े
किसे दे दें?”

रमेश ने कहा,
“जैसा ठीक लगे।”

“मतलब?”

“मतलब…
अब तो वो यहाँ रहने वाले नहीं हैं।”

कविता ने साड़ी को देखा।
“माँ की ये साड़ी
किसी गरीब को दे देते हैं।”

रमेश बोला—
“उन्हें ये साड़ी पसंद थी।”

कविता ने कहा,
“पसंद बहुत कुछ होता है रमेश।
हर पसंद संभाल कर तो नहीं रख सकते।”

रमेश ने साड़ी को हाथ में लिया
और धीरे धीरे उसे सहलाने लगा , उसे माँ के स्पर्श का आभास हो रहा था । उसकी आँखें नम आईं ।

रात को रमेश अकेला बैठा था।

उसे याद आया,
पापा ने जाते समय कहा था,
“बेटा, हमने खुद फैसला लिया है।”

उस वक़्त उसे यह बात समझदारी लगी थी।
पर आज उसे यह बात अपनी हार लग रही थी।

उसने पहली बार साफ़-साफ़ सोचा,

हमने उन्हें घर से नहीं निकाला।
बस उन्हें यह महसूस करा दिया
कि यह घर अब उनका नहीं रहा।”

 

अध्याय-5

क्लब में नए साल की रात थी।

रोशनी ज़्यादा थी,

आवाज़ें ऊँची,

और सब कुछ इतना चमकीला कि कोई किसी के भीतर झाँकने की कोशिश न करे।

साकेत और अन्विता भीड़ का हिस्सा थे।

डांस फ़्लोर पर लोग खुश होने की पूरी कोशिश कर रहे थे।

अन्विता ने हँसते हुए कहा,

“कम से कम यहाँ कोई गंभीर बात नहीं करेगा।”

साकेत मुस्कुराया। “नया साल है… पुराने सवाल आज छुट्टी पर होंगे।”

डिनर अनाउंस हुआ।
संयोग से
आठ–दस लोग
एक ही बड़ी गोल मेज़ पर बैठ गए।

कोई किसी को पहले से नहीं जानता था।
बस वही औपचारिक मुस्कानें,
वही ‘हाय–हेलो’।

“मैं अमित,”
एक आदमी ने कहा,
“आईटी में हूँ।”

“संदीप,”
दूसरा बोला,
“मार्केटिंग।”

“रमेश,”
तीसरा,
“ऑपरेशन्स।”

परिचय हल्का था,
जैसे होना चाहिए।

खाना आने में समय था।
बातें अपने आप काम से बच्चों तक पहुँच गईं।

अमित ने कहा,
“आजकल बच्चों के पास टाइम ही नहीं होता।
हम तो बस चाहते हैं कि वो अपने पैरों पर खड़े हों।”

संदीप हँसा,
“और जब खड़े हो जाते हैं तो हमें बैठा देते हैं।”

सब औपचारिक  हंसी हँसे ।
अन्विता ने पूछा,
“आपके बच्चे क्या कर रहे हैं?”

रमेश बोला,
“एक ही बेटा है।
स्कूल में है।
हम दोनों काम करते हैं, तो ज़्यादातर मैड के साथ रहता है।”

अन्विता ने पूछा ,

“क्यों , घर में और कोई नहीं है ,  मेरा मतलब आपके पेरेंट्स” 

रमेश बिना नजरें मिलाए बोला,
“दोनों है, साथ हैं। पर हमारे साथ नहीं रहते।  उन्होंने अपनी उम्र के लोगों के साथ रहना पसंद किया । उन्होंने खुद कहा था, अब हमें बच्चों के बीच नहीं पड़ना।”

नेहा (अमित की पत्नी) बोली—
“हमारे माँ-बाप के ज़माने में अलग तरह की ज़िंदगी थी। और आज की ज़िंदगी भी कम मुश्किल नहीं है। हर चीज़ को बैलेंस करना पड़ता है।”

साकेत ने यूँ ही पूछा—
“आपके माता-पिता कहाँ रहते हैं?”

अमित ने कहा,
“पापा अब…एक जगह रहते हैं जहाँ उनकी पूरी देखभाल होती है।”

अन्विता ने पूछा,

“ओह…कस्बे में?”

नेहा ने तुरंत संभाल लिया,
“नहीं, शहर के बाहर। काफ़ी शांत जगह है।”

कोई नाम नहीं लिया गया।

संदीप ने  भी कहा,
“ हाँ , वर्किंग कपल के साथ पेरेंट्स बोर हो जाते है , कोई बात करने को भी नहीं मिलता”।

 उसने जोड़ा ,

“आजकल…सबको अपनी उम्र के लोग ज़्यादा समझते हैं”।

मेज़ पर
कुछ सेकंड के लिए
कोई नहीं बोला।

फिर किसी ने कहा,
“आजकल ये सब काफ़ी नॉर्मल हो गया है।”

सबने सिर हिला दिया।
नॉर्मल शब्द सबसे आरामदेह था।

साकेत ने खाना छुआ तक नहीं।
उसे अचानक शांतिवन की कुर्सियाँ  पर बैठी आकीर्तियां  याद आईं,
धूप में बैठी,खामोश।

उसने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि यहाँ कहने को और कुछ था भी नहीं ।

खाना खत्म हुआ।
लोग उठे,
हाथ मिलाए।

“मिलकर अच्छा लगा।”

“हैप्पी न्यू ईयर!”

लॉन में आतिशबाज़ी शुरू हो चुकी थी।

साकेत और अन्विता चुपचाप क्लब से निकालकर अपने घर की ओर चल दिया । रास्ते भर कार में एक अजीब स सन्नाटा पसरा रहा ।

अध्याय-6

शांतिवन उस दिन भी वैसा ही था,
वही आँगन, वही धूप,
वही कुर्सियाँ।

बस एक कुर्सी खाली थी।

साकेत और अन्विता कुछ दिनों बाद फिर वहाँ आए थे।
इस बार किसी वजह से नहीं, बस मन नहीं माना था।

अन्विता ने आँगन में नज़र घुमाई।
“आज भी सब लोग वहीं बैठते हैं,”
उसने धीमे से कहा।

साकेत ने सिर हिलाया।
फिर उसकी नज़र उस खाली कुर्सी पर टिक गई।

वह कुर्सी
दूसरों जैसी ही थी,
लकड़ी की, थोड़ी घिसी हुई,
पर आज
कुछ अलग लग रही थी।

केयरटेकर पास से गुज़रा।
साकेत ने यूँ ही पूछा,
“आज कोई कम लग रहा  हैं?”

उसने रुककर कहा,
“कल रात एक बुज़ुर्ग चले गए।”

अन्विता ने अनजाने में पूछा,
“उनके…?”

केयरटेकर समझ गया।
“हाँ, बच्चे थे। कह रहे थे आज आने वाले हैं।”

उसने वाक्य पूरा नहीं किया। ज़रूरत भी नहीं थी।

साकेत ने पूछा नहीं, कौन थे।
किसके पिता।
किसकी माँ।

उसकी आँखों के सामने
सिर्फ़ एक तस्वीर थी,
एक आदमी या एक औरत,
जो शायद कल तक यहीं बैठा होगा,
धूप में, किसी इंतज़ार के साथ।

अन्विता उस कुर्सी के पास जाकर खड़ी हो गई।
हाथ से कुर्सी की पीठ थपथपाई, जैसे कोई वहाँ अब भी बैठा हो।

“अजीब है,”
उसने कहा,
“इतनी भीड़ में एक खाली कुर्सी कितनी ज़्यादा दिखती है।”

साकेत कुछ नहीं बोला। उस खाली कुर्सी में साकेत को अपने पिता की कुर्सी दिखी,
वह कुर्सी जो उनके घर में बरामदे में रखी रहती थी।

उसे याद आया, पिता कहते थे,
“धूप अच्छी लगती है इस उम्र में।”

शांतिवन में कोई शोर नहीं था।
कोई रोना नहीं।
कोई शिकायत नहीं।

सब कुछ उतना ही शांत था
जितना होना चाहिए था।

बस एक जगह खाली थी।

शांतिवन से निकलते हुए साकेत ने जेब से फोन निकाला।

कुछ पल स्क्रीन को देखता रहा।
फिर कॉल मिलाई।

उधर दो रिंग के बाद आवाज़ आई,
“हाँ बेटा।”

साकेत ने एक पल को आँखें बंद कर लीं।
“पापा… मैं यूँ ही फोन कर रहा था।”

“सब ठीक है?”
पिता की आवाज़ में कोई घबराहट नहीं थी,
बस सहज जिज्ञासा।

“हाँ… सब ठीक है।”

दूसरी तरफ़ से हल्की-सी खाँसी सुनाई दी।
फिर पिता बोले—
“माँ पास में बैठी है। चाय पी रहे हैं।”

साकेत ने कहा,
“अच्छा है। धूप में बैठा कीजिएगा।”

“हाँ बेटा,”

पिता मुस्कुराए होंगे साकेत को यक़ीन था।

फोन कट गया।

साकेत ने फोन नीचे किया।
अन्विता चुपचाप उसके पास खड़ी थी।

“कुछ कहा?” उसने पूछा।

साकेत ने सिर हिलाया।
“नहीं… बस सुना।”

कुछ रिश्तों को बचाने के लिए बहुत कुछ कहने की ज़रूरत नहीं होती बस
समय रहते आवाज़ सुन लेना काफ़ी होता है।

यह कहानी किसी एक परिवार की नहीं है।

यह उन सवालों की है,
जो हम सब समय से पहले टाल देते हैं

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Chain-ki-ek-saans

चैन  की एक सांस

अध्याय 1: बरामदे की धूप और एक ख़बर

बरामदे में धूप एक थकी हुई चादर की तरह बिछी थी। हवा में जनवरी की हल्की ठंडक थी, पर अतुल के भीतर एक अजीब-सी बेचैनी उमड़ रही थी। वह कुर्सी पर बैठा अख़बार खोले हुए था, मगर शब्द उसकी आँखों से टकराकर लौट जाते थे। वह पढ़ नहीं रहा था — बस समय काट रहा था।

मोबाइल पर एक हल्की-सी बीप हुई।

सील का नाम चमका।

अतुल ने बिना किसी खास उत्सुकता के स्क्रीन खोली।
संदेश छोटा था — मगर जैसे किसी ने भीतर से कुछ तोड़ दिया हो।

“सर, सुरेश नहीं रहा।”

उसके नीचे एक और मैसेज था — सुरेश की पत्नी का।
अधूरी पंक्तियाँ, टूटे वाक्य, जैसे शब्द भी रो रहे हों।

अतुल का हाथ रुक गया।
मोबाइल उसकी उँगलियों में यूँ ही अटका रह गया।

सुरेश…

वही सुरेश, जो कोलकाता में उसका ड्राइवर था।
हर सुबह ठीक समय पर गाड़ी लेकर दरवाज़े पर खड़ा, होंठों पर शिष्ट मुस्कान और वही सधी हुई आवाज़;
“नमस्ते साहब।”

कभी शिकायत नहीं।
कभी बीमारी नहीं।
बीमारी का बहाना भी नहीं।

अभी दो साल पहले की ही तो बात थी , वह बिल्कुल ठीक था।

अतुल ने झट से सील को फोन मिला दिया।

“हाँ साहब…”
सील की आवाज़ में भी एक बोझ था।

“क्या हुआ?” अतुल ने धीमे से पूछा।

“लिवर की प्रॉब्लम थी, सर… सब अचानक हो गया।”

अचानक।

फोन उसके कान से लगा था, पर सील की आवाज़ जैसे बहुत दूर से आ रही थी।

“अचानक… ज़िंदगी अक्सर अचानक ही तो खत्म होती है,”
अतुल ने मन ही मन कहा।

एक पल के लिए उसे कुछ राहत-सी हुई।

सुरेश के बच्चे सेटल थे।
बेटा नौकरी में था।
बेटी की शादी हो चुकी थी।

“कम से कम सुरेश चैन से तो गया होगा,”उसने खुद से कहा।

और उसी क्षण , उसके भीतर किसी कोने  ने कोमल का नाम लिया।

कोमल।

नौकरी में, आत्मनिर्भर, मज़बूत।
दुनिया के सामने आत्मविश्वास से भरी हुई।
लेकिन… अकेली।

बस शादी नहीं करना चाहती।

शादी की बात छेड़ो तो जैसे भीतर आग लग जाती है।

अतुल को अनायास  कोमल के शब्द कानों मे गूंज गए;

“पापा, शादी के लिए कोई उम्र की सीमा नहीं होती,”
उसने वह ठंडे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा था ।
“जब मेरा सोलमेट मिलेगा, तब शादी हो जाएगी।
और अगर ऊपर वाले ने सोलमेट बनाया ही नहीं, तो शादी ज़रूरी क्यों है?
इंसान सिंगल भी तो रह सकता है।”

अतुल की छाती में कहीं गहरी-सी टीस उठी।

अगर उसे कुछ हो गया…
तो कोमल का क्या होगा?

कौन होगा जो उसके बुखार में उसके माथे पर हाथ रखेगा?
कौन होगा जो रात की चुप्पी में उसके डर सुनेगा?

सुरेश चला गया था, शायद चैन से गया था, क्योंकि उसके बच्चे अपने-अपने जीवन में सुरक्षित थे, अकेले नहीं थे ।

और उसकी बेटी?

बरामदे में धूप धीरे-धीरे सरक रही थी। पर अतुल के भीतर एक लंबी परछाईं फैल चुकी थी। वह पहली बार साफ़ महसूस कर रहा था, मौत से ज़्यादा डरावना होता है किसी अपने को अकेला छोड़ जाना।

 

अध्याय 2 : खामोश कमरों की लड़ाई

रसोई से बर्तनों की आवाज़ आ रही थी,
कुछ ज़्यादा तेज़, कुछ ज़्यादा तीखी।
जैसे हर प्लेट, हर कटोरी के साथ विमला अपने भीतर का ग़ुस्सा भी पटक रही हो।

अतुल बरामदे से उठकर अंदर आया।
घर वैसा ही था,
साफ़, सलीकेदार, शांत।
पर उस शांति के नीचे एक खदबदाती हुई बेचैनी थी।

“आज भी आप बेटी को फ़ोन नहीं करेंगे?”
विमला ने बिना उसकी ओर देखे कहा।
आवाज़ में सवाल कम, शिकायत ज़्यादा थी।

अतुल ने कुर्सी खींचकर बैठते हुए थकी हुई साँस ली।
“क्या कहूँ?”
उसने धीरे से कहा।
“वही शादी की बात? हर बार वही?”

विमला ने प्लेट सिंक में रखी—कुछ ज़्यादा ज़ोर से।
“तो फिर कब कहेंगे?”
उसकी आवाज़ ऊँची हो गई।
“आपको पता भी है वह कितनी बड़ी हो चुकी है?”

“पता है,”
अतुल ने बिना नज़र मिलाए कहा।
“पर क्या उसे पता है कि अकेलापन क्या होता है?”

विमला पलटकर उसकी ओर देखी।
उसकी आँखों में थकान थी, पर उससे ज़्यादा डर।
“आप ही ने उसे ये सब सिखाया है, वो आप से ज्यादा खुली है , कैसे बाप हैं आप जो अपनी बेटी को समझ भी नहीं सकते” ।
वह लगभग चिल्ला उठी।
“हमेशा उसकी तरफ़दारी, हमेशा आज़ादी!
अब भुगतिए।”

कमरे में एक सन्नाटा उतर आया।

इतनी लड़ाइयों के बाद
अब शब्द भी थक गए थे।

अतुल खड़ा हुआ।
“हर बात में मेरी ही गलती होती है, है न?”
उसकी आवाज़ पहली बार काँपी।
“मैं भी तो उसी का पिता हूँ, विमला।
क्या मुझे उसे समझने का हक़ नहीं?”

“समझने के नाम पर आप उसे ढाल बना लेते हैं,”
विमला ने कटु स्वर में कहा।
“और मैं हर रात यही सोचती रहती हूँ कि अगर हम दोनों चले गए तो वह अकेली कैसे जिएगी?”

अतुल के पास कोई जवाब नहीं था।

वह उस रात अपना तकिया उठाकर ड्रॉइंग रूम में चला गया।
बस यूँ ही। बिना कुछ कहे ।

और फिर वही उसका कमरा बन गया।

विमला ने भी कभी उसे वापस बुलाने की कोशिश नहीं की।

दिन बीतते गए। अतुल कम बोलने लगा।उसने सीख लिया था कि कोई भी बातचीत किसी न किसी मोड़ पर कोमल की शादी पर आकर एक कड़वे अंत में बदल जाती है। रात को उसे नींद नहीं आती थी। वह शतरंज की बिसात खोल लेता।

मोहरों की दुनिया साफ़ थी, या तो जीत, या हार। कोई भावनात्मक उलझन नहीं। कोई बेटी नहीं। कोई पत्नी नहीं। बस काले और सफ़ेद मोहरे। रात-रात भर वह अकेले चालें चलता रहता। यही उसका घर से भागने का रास्ता बन गया था।

एक दिन ऑफिस में मीटिंग चल रही थी। एयर-कंडीशनर की ठंडी हवा के बीच अतुल के सीने में अजीब-सी जकड़न उठी।साँस भारी होने लगी।
पसीना।
चक्कर।

टेबल, कुर्सियाँ, चेहरे—सब घूमने लगे।

फिर अंधेरा।

जब आँख खुली
तो सामने सफ़ेद छत थी।
मशीनों की धीमी बीप-बीप।
और पास खड़ी विमला का काँपता हुआ चेहरा।

“स्ट्रेस से हार्ट पर असर पड़ा है,”
डॉक्टर ने कहा।
“बहुत ज़्यादा दबाव है।”

दबाव?

अतुल को हल्की-सी हँसी आ गई।

अगर डॉक्टर उसके मन के भीतर झाँक पाता,
तो शायद शब्द बदल जाते।

“बहुत ज़्यादा डर है।”

 

अध्याय 3 : बेटी और मृत्यु के बीच

अस्पताल की रातें दिन से ज़्यादा लंबी होती हैं। रोशनियाँ बुझती नहीं है पर  अँधेरा फिर भी मन के भीतर उतर आता है।

अतुल बिस्तर पर लेटा छत को देख रहा था।
मशीनों की बीप-बीप जैसे उसके दिल की धड़कनों को गिन रही हो।

विमला पास की कुर्सी पर बैठी थी,  
सीधी, चुप, जैसे किसी अनकहे अपराध के लिए सज़ा काट रही हो।

तभी दरवाज़ा खुला।

कोमल थी।

बेंगलुरु से सीधे आई हुई,  आँखों के नीचे थकान, चेहरे पर घबराहट।

“पापा…”

एक शब्द।
बस एक शब्द।

पर उसमें कई  दिनों की दूरी एक पल में सिमट आई।

अतुल ने उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में वही डर था
जो वह खुद वर्षों से दबाए बैठा था।

कोमल ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया।
वही हाथ
जो कभी उसे चलना सिखाता था,
आज खुद सहारे को तरस रहा था।

“आप ठीक हैं न?”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।

अतुल मुस्कुराने की कोशिश की।
“डॉक्टर तो यही कहते हैं।”

वह चुप हो गई।

उस चुप्पी में
अतुल ने उसकी सारी लड़ाइयाँ सुन लीं।

“मैं तुमसे कुछ नहीं माँगूँगा,”
उसने धीमे से कहा।
“बस इतना बताओ, तुम खुश हो?”

कोमल ने उसकी ओर देखा।
कुछ कहना चाहा…
फिर रुक गई।

खुश?

शायद यही सबसे कठिन सवाल था।

नर्स आई।
“पेशेंट को आराम चाहिए,”
उसने कहा।

कोमल को बाहर जाना पड़ा।

वह कॉरिडोर की बेंच पर बैठ गई।
अस्पताल की गंध,
लोगों की फुसफुसाहट,
मशीनों की आवाज़, सब उसे भीतर तक थका रहे थे।

सब कहते हैं—
वह ज़िद्दी है।
आधुनिक है।
खुदगर्ज़ है।

पर कोई यह नहीं पूछता—
क्यों?

वह शादी से डरती थी।
इसलिए नहीं कि वह किसी से प्यार नहीं कर सकती, बल्कि इसलिए कि उसने अपने आसपास इतनी औरतों को
शादी के बाद खुद से दूर होते देखा था। अपनी आवाज़ खोते हुए। अपने सपने समेटते हुए।

और उससे कहा जाता है, “डर क्यों लगता है?”

वह जानती थी, वह भाग नहीं रही है।
वह बस खुद को बचा रही है।

पर आज, पिता को उस सफ़ेद बिस्तर पर देखकर उसकी सारी तर्कशीलता कहीं ढह गई थी।

शायद हर मज़बूत बेटी के भीतर एक डरी हुई बच्ची भी रहती है। और आज वह बच्ची जाग गई थी।

 

अध्याय 4: पीछे लौटता हुआ समय

अस्पताल की रात धीरे-धीरे गाढ़ी हो रही थी। खिड़की के बाहर शहर की रोशनियाँ तारों को ढक रही थीं। अतुल को नींद कहाँ आने वाली थी। मशीनों की बीप-बीप किसी दूर की घड़ी जैसी लग रही थी, हर सेकंड को ज़रा ज़्यादा ज़ोर से गिनती हुई। उसने आँखें बंद कीं। और समय पीछे चल पड़ा।

एक टूटा हुआ सा घर।
कच्ची दीवारें।
बरसात में टपकती छत।

उसका बचपन।

पिता—पीडब्ल्यूडी में खलासी।
हर सुबह कंधे पर औज़ारों की थैली।
और माँ, दिन भर चूल्हे और चिंता के बीच उलझी हुई।

गरीबी वहाँ शोर नहीं करती थी, वह हर चीज़ में चुपचाप घुली रहती थी।

पर पिता ने कभी बच्चों की पढ़ाई में कमी नहीं आने दी।

“पढ़ ले बेटा,”
वे कहते थे,
“ताकि तुझे मेरी तरह ज़िंदगी से लड़ना न पड़े।”

अतुल पढ़ता था, भूख के साथ, कमज़ोर चप्पलों के साथ,फटे कपड़ों के साथ,और एक ज़िद के साथ।

वह हमेशा अव्वल आता।धीरे-धीरे घर के हालात बदले।बड़े भाई नौकरी में लग गए।उसका दाख़िला
भी एक अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया।अब उसके होंठों पर अक्सर मुस्कान रहती। एक बार ट्रेन में
एक अजनबी ने कहा था, “बेटा, यह मुस्कान मत खोना।बहुत आगे जाओगे।” आज उसे वह आदमी याद आ रहा था।

फिर समय आगे खिसका।

कॉलेज।
हॉस्टल।
पहली नौकरी।

और फिर
रेलवे में ग्रुप–A अफ़सर।

पिता की आँखों में जो गर्व चमकता था, उससे बड़ा कोई इनाम नहीं था।

उसने ईमानदारी चुनी।
दो नंबर की कमाई से दूर रहा।

शायद इसीलिए वह कभी अमीर नहीं हुआ, पर कभी शर्मिंदा भी नहीं हुआ।

फिर विमला आई।

खूबसूरत।
सलीकेदार।
आँखों में भविष्य के सपने।

उनकी शादी हुई।

छोटा-सा घर।
छोटी-सी खुशियाँ।

और फिर
कोमल।

जब उसने पहली बार अपनी बेटी को गोद में लिया, तो लगा जैसे दुनिया ने उसे एक नाज़ुक-सी ज़िम्मेदारी सौंप दी हो। “इसे कभी दुख नहीं होने दूँगा,” उसने खुद से वादा किया था। फिर बेटा आया। और घर हँसी से भर गया।

वीकेंड पर वह बच्चों के लिए खाना बनाता। फ़र्श पर बैठकर उनके साथ खेलता। वह पिता नहीं, एक बड़ा बच्चा बन जाता।

और फिर…

समय तेज़ हो गया।

बच्चे बड़े हो गए।
कोमल बेंगलुरु चली गई।
बेटा हैदराबाद।

घर में खामोशी आने लगी। विमला की चिंता बढ़ने लगी। और उसके साथ ग़ुस्सा। और उसकी अपनी चुप्पी।

शतरंज। अलग कमरा। अलग रातें।

और अब, यह अस्पताल।

अतुल की आँखों से एक आँसू तकिए में उतर गया।

“मैंने सब सही किया था,” उसने सोचा।
“तो फिर ये डर क्यों?”

और तभी सुरेश का चेहरा उभरा। सुरेश के बच्चे
सेटल थे। वह चैन से गया था।

और वह?

“काश…”
उसके भीतर से आवाज़ आई,
“मेरी बेटी भी किसी के साथ हो जब मैं न रहूँ।”

मशीन ने धीमे से बीप की।और अतुल धीरे-धीरे
वर्तमान में लौट आया।

 

अध्याय 5 : उम्मीद की धीमी वापसी

अतुल की हालत अब सुधार रही थी पर शरीर अभी भी जैसे किसी और का था। हर साँस में हल्का-सा दर्द, हर हरकत में एक अजनबी-सी थकान।

डॉक्टरों ने कहा,
“ख़तरा टल गया है,पर अब ज़िंदगी का तरीका बदलना होगा।”

ज़िंदगी का तरीका…अतुल ने मन ही मन मुस्कुरा दिया।
काश कोई डॉक्टर दिल के अंदर के तरीक़े भी बदल सकता।

तीन दिन बाद बेटा हैदराबाद से आ गया।

लंबा, तंदुरुस्त, जिम में तराशी हुई देह, और आँखों में वही पुरानी शरारत।

“पापा ,” उसने आते ही कहा, “अब आपको वापस फॉर्म में लाना मेरी ज़िम्मेदारी है।”

अतुल हँस पड़ा।
“तू मुझे रिटायर्ड खिलाड़ी समझ रहा है क्या?”

“रिटायर्ड नहीं,”
बेटा बोला, “रिलॉन्च।”

उसके आने से घर में कुछ हलचल लौट आई।

सुबह-सुबह वह अतुल को टहलने ले जाता। धीरे-धीरे पार्क के चक्कर बढ़े। फिर बैडमिंटन की हल्की रैलियाँ।
फिर जिम के हल्के-फुल्के उपकरण। “साँस, पापा … साँस!” वह हँसते हुए कहता।

और सच में अतुल की साँसें धीरे-धीरे गहरी होने लगीं।

विमला यह सब चुपचाप देखती। उसके भीतर एक पुरानी उम्मीद फिर से सिर उठाने लगी थी। कोमल भी देख रही थी। पिता की चाल में धीरे-धीरे लौटती मज़बूती, आँखों में हल्की चमक। शायद सब ठीक हो रहा था।

और फिर एक दिन अतुल अकेले बाहर गया। सिर्फ़ कुछ सामान लेने। सड़क पार करते हुए उसने पीछे से आती हुई तेज़ आवाज़ सुनी। फिर कुछ नहीं।

समयचक्र ने एक बार फिर अतुल को  फिर वही सफ़ेद छत और  वही मशीनें के बीच ल पटका था ।

इस बार विमला रो रही थी। खुलकर।

डॉक्टर की आवाज़ जैसे दीवारों से टकरा रही थी,

“हेड इंजरी है। अभी कुछ कहा नहीं जा सकता।”

कोमल दरवाज़े के पास खड़ी थी।उसकी दुनिया फिर से एक बिस्तर के चारों ओर सिमट गई थी।

उसे पहली बार साफ़ महसूस हुआ,  यह बार-बार अस्पताल आना इत्तेफ़ाक़ नहीं है। यह वक़्त का  कुछ इशारा है। और वक़्त कभी-कभी छूटने से पहले ज़ोर से दस्तक देता है।

 

अध्याय 6 : जब भाई दीवार बना

अस्पताल की सुबहें रातों से ज़्यादा भारी होती हैं।
रात में उम्मीद सो जाती है, सुबह डॉक्टरों की आवाज़ उसे जगा देती है।

अतुल अब भी बेहोश था।

उसके चेहरे पर वही शांत भाव था, पर मशीनों की बीप कह रही थी कि सब कुछ शांत नहीं है।

विमला कुर्सी पर बैठी थी, सीधी, जैसे अब गिरने की इजाज़त नहीं बची हो।
कोमल खिड़की के पास खड़ी थी, शहर को देखते हुए भी कहीं और देख रही थी।

तभी दरवाज़ा खुला। भाई अंदर आया। तेज़ क़दम। पर आँखों में संयम।

“डॉक्टर से बात हो गई,” उसने शांत स्वर में कहा।
“अभी कुछ घंटों में होश आ सकता है।”

विमला ने राहत की साँस ली।
कोमल ने पहली बार  भाई  की ओर ध्यान से देखा।

वह हमेशा उसे छोटा भाई ही मानती रही थी, पर आज वह किसी स्तंभ की तरह खड़ा था।

“माँ, आप घर जाकर थोड़ा आराम कर लीजिए,” उसने कहा। “मैं यहाँ हूँ।”

विमला टस से मस  नहीं हुई ।“ में तेरे पापा को इस हाल में छोड़ के कैसे जा सकती हूँ “
 विनोद ने कहा , “ माँ , तुम्हें हम लोगों का भी तो ख्याल रखना है’ तुम भी बीमार हो जाओगी तो हम लोगों का ख्याल कौन रखेगा ? चली जाओ  और कुछ देर बाद आ  जाना”

विमला  ने अनमने मन से कहा “तू रहेगा न यहाँ ?”

“ हाँ माँ , मैं हूँ न,” उसने सहजता से कहा।

विमला चली गई। कमरे में कोमल और उसका भाई रह गए।

कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर भाई बोला, “तुम हमेशा सब  कुछ अकेले  करना चाहती  हो, है न?”

कोमल चौंकी। “क्या मतलब?”

“तुम मजबूत बनने की कोशिश करती हो,” उसने कहा।
“पर मजबूत होना अकेले होना नहीं होता।”

कोमल ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गई।

 भाई ने धीरे से कहा,“मुझे ऐसी sपरेशानी मे अकेले  रहने से  डर  लगता है।”

कोमल ने पहली बार किसी पुरुष को यह कहते सुना।

“मुझे कोई चाहिए,” उसने आगे कहा।
“जो तब भी रहे जब मैं थक जाऊँ।”

कमरे में एक नई चुप्पी उतर आई।

कोमल को अपने सारे तर्क अचानक थोड़े खोखले लगने लगे।

शायद आज़ादी कभी-कभी किसी का हाथ थामने से छोटी नहीं होती।

तभी मशीन ने एक अलग-सी आवाज़ की।

अतुल की उँगली हल्की-सी हिली। और कमरे में जैसे साँस लौट आई।

 

अध्याय 7: अकेलेपन का सच

आईसीयू के बाहर बैठकर कोमल का दम घुटने लगा था। वह बस कुछ देर के लिए चलते हुए खुद को समेटना चाहती थी। तभी पास के वार्ड से एक कमजोर-सी आवाज़ आई,

“दीदी… पानी…”

कोमल रुक गई। आवाज़ में दर्द से ज़्यादा अकेलापन था।

वह अंदर चली गई। बिस्तर पर एक लड़की लेटी थी।
पैर पर प्लास्टर, माथे पर पट्टी, चेहरे पर चोटों के निशान।

कमरे में किसी और के होने का कोई नामोनिशान नहीं था ,  न कोई  बैग, न कोई चप्पल।

कोमल ने गिलास उठाया और उसके होंठों तक ले गई।

“धन्यवाद,” लड़की ने धीमे से कहा।

“आपका कोई साथ आया नहीं?” कोमल ने पूछा।

लड़की कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “आने को कोई है ही नहीं।”

“मतलब?”

“माँ-बाप पिछले साल कोविड में चले गए।”
उसकी आवाज़ सपाट थी, जैसे रो-रोकर सूख चुकी हो।

“और कोई रिश्तेदार?”

“सब दूर हैं…
और आजकल दूरवाले पास नहीं आते।”

कोमल चुप हो गई।

कुछ पल बाद उसने कहा—
“आपका नाम क्या है ? “आप बहुत हिम्मतवाली लगती हैं।”

लड़की ने हल्की-सी हँसी हँसी।
“मीरा नाम है मेरा” । “हिम्मत तब तक लगती है जब तक सब ठीक चलता है।” उसने जबाब दिया ।

“आप यहाँ अकेले हैं,” कोमल ने कहा, “डर नहीं लगता?”

मीरा ने उसकी ओर देखा। “बहुत।”

“तो आपने शादी क्यों नहीं की?”
कोमल ने अनायास पूछ लिया। फिर खुद ही चौंकी।

मीरा कुछ पल उसे देखती रही। फिर बोली,  “क्योंकि मैं सोचती थी, मुझे किसी की ज़रूरत नहीं।
मैं अपने आप में पूरी हूँ।” अब कोमल को उसके शब्द अपने जैसे लगे।

“मैं भी यही मानती हूँ,” कोमल ने धीमे से कहा।

मीरा की आँखों में एक अजीब-सी पहचान उभरी।

“तभी तो आपने पूछा कि मैं अकेली क्यों हूँ,” उसने कहा।
“वरना ज़्यादातर लोग सिर्फ़ तरस खाकर चले जाते हैं।”

कुछ पल की चुप्पी।

“आज समझ आ रहा है,” मीरा ने कहा,
“कि आत्मनिर्भर होना अकेला होना नहीं होना चाहिए।”

“आप पछता रही हैं?” कोमल ने पूछा।

“हाँ,” मीरा ने बिना झिझक कहा।
“क्योंकि रात को जब डर लगता है,
तो कोई चाहिए जो बस कह दे, मैं हूँ।”

कोमल की आँखें भर आईं। यह पहली बार था जब किसी अजनबी की बात उसके भीतर इतनी गहराई से
उतर रही थी।

 

अध्याय 8: जहाँ ईश्वर हाथ बन गया

सुबह की रोशनी अस्पताल में अक्सर झूठी उम्मीद लेकर आती है।

विमला कुर्सी पर बैठी थीं। रुमाल उनकी मुट्ठी में पिस रहा था।

विनोद दरवाज़े के पास खड़ा था, जैसे अगर एक पल भी बैठ गया तो गिर पड़ेगा।

कोमल शीशे के पार अपने पिता को देख रही थी।
सफ़ेद बिस्तर।
सफ़ेद चादर।
मशीनों से बँधा हुआ जीवन।

डॉक्टर बाहर आया।

“ब्रेन इंजरी के कारण
स्वेलिंग बढ़ रही है,” उसने कहा।
“अगले कुछ घंटे बहुत अहम हैं।”

विमला की साँस जैसे टूट गई।

“ हे भगवान इन्हे बचा ले ?” काँपते हुए उसके होंठ बुदबुदाए।

विनोद ने माँ को संभाला। कोमल वहीं जड़ हो गई। पहली बार उसे लगा की वो पिता को खो भी सकती है।

कुछ देर बाद नर्स ने कोमल से कहा, “आपके पापा को अभी ऑब्ज़र्वेशन में रखा गया है। आप लोग अंदर नहीं जा सकते।”

कोमल बाहर, कॉरिडोर में टहलने  लगी। सिर घूम रहा था। दिल जैसे किसी ने दबोच लिया हो।

वह उसी वार्ड के पास पहुँच गई,जहाँ मीरा थी। मीरा ने उसे देखा।

“आपके चेहरे से लग रहा है कोई अपना बहुत बीमार है,” उसने कहा।

कोमल कुछ बोल नहीं पाई। बस कुर्सी पर बैठ गई।

“मैं भी ऐसे दौर से गुजर चुकी हूँ ,” मीरा ने धीमे से कहा। “माँ-बाप… एक ही हफ्ते में।” बोलते बोलते उसका गला रुँध आया ।

“जब डॉक्टर चुप हो जाते हैं,” मीरा बोली, “तो डर सबसे ज़्यादा लगता  है।”

कोमल की आँखों से आँसू खुद निकल आए।

“आपके पास लोग हैं,” मीरा ने  खिड़की की ओर देखते हुए कहा । “यह बहुत बड़ी ताक़त है।”

कोमल को अब लगने लगा था जब तक सब ठीक चल रहा है तो किसी अपने की जुरुरत शायद  महसूस  नहीं होती पर  परेशानी के  वक्त  में  इंसान कितना अकेला और असहाय होता है अगर कोई उसके साथ न हो ।

 

अध्याय 9: डर और विश्वास के बीच

 

वो रात जैसे किसी ने सबकी साँसों को उधार पर रख लिया था। अतुल को अभी भी होश नहीं आया था पर  डॉक्टर ने कहा था कि  कन्डिशन स्टैबल है । सुबह होते ही कोमल माँ और भाई के लिए चाय लेने गई । अस्पताल के कैफेटेरिया में  केतली  में चाय उबल रही थी।भाप में अदरक की गंध घुली थी।

कोमल कप पकड़कर खड़ी थी,पर हाथ काँप रहे थे। जब कैन्टीन बॉय ने चाय कोमल के कप में डाली तो चाय छलक कर तश्तरी में गिर गई।

“अरे… संभालिए।”
पीछे से किसी ने कहा।

वह मीरा थी, व्हीलचेयर पर बैठी हुई,पैर प्लास्टर में जकड़ा।

“आप यहाँ?” कोमल चौंकी।

“ड्रेसिंग बदलवाने ले जा रहे हैं,” मीरा ने कहा।
“नर्स अभी आती होगी।”

मीरा उसे देखते ही बोली,“आपकी आँखों से लग रहा है, आज बहुत मुश्किल दिन है।”

“मेरे पापा…” कोमल की आवाज़ टूट गई। “पता नहीं…”

मीरा ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।
“जब डॉक्टर चुप हो जाते हैं, तब डर बोलने लगता है।”

कोमल पहली बार खुद को रोते हुए नहीं रोक पाई।

कुछ देर बाद उसने पूछा, “आप भगवान को मानती हैं?”

मीरा चौंकी। “हाँ… मानती हूँ।”

“तो फिर,” कोमल ने कहा, “आप अकेली क्यों डरती हैं?
अगर भगवान है तो वह संभाल लेगा न?”

मीरा कुछ देर चुप रही। फिर बोली,
“मैं भी यही सोचती थी। माँ-बाप के जाने के बाद भी।”

“और अब?” कोमल ने पूछा।

“अब समझ में आ रहा है,” मीरा ने कहा,
“कि भगवान खुद आकर पानी नहीं देता। वह किसी को भेज देता है।”

कोमल ने उसकी ओर देखा।

“जैसे आप आईं,” मीरा बोली,
“अगर आप न आतीं, तो भगवान का सहारा भी मेरे लिए बहुत दूर होता।”

कोमल के भीतर कुछ हिल गया।

“तो क्या भगवान काफ़ी नहीं?” उसने पूछा।

“भगवान काफ़ी है,” मीरा ने कहा,
“पर वह चाहता है कि हम किसी को चुनें, जिसके ज़रिए वह हमें थाम सके।”

कोमल की आँखों में पिता का चेहरा उभरा।

डॉक्टर।
विनोद।
विमला।

सब लोग भगवान ही  ने तो उसके लिए भेजे गए थे।

“मैंने हमेशा सोचा,” कोमल ने धीमे से कहा,
“कि अगर मैं किसी पर निर्भर हो गई तो कमजोर हो जाऊँगी।”

मीरा मुस्कुराई। “निर्भर होना नहीं, गलत इंसान पर निर्भर होना कमज़ोरी है।”

कोमल की साँसें धीमी हो गईं।

पहली बार उसके भीतर यह विचार आया कि,

“मैं अकेले मजबूत हूँ, पर किसी के साथ शायद पूरी हो सकती हूँ ।

 

 

अध्याय 10: एक साँस जो थमी नहीं

जब कोमल कैन्टीन से अपने विचारों  में उलझी पिता के कैबिन के पास   चाय लेकर पहुंची  तो उसी छड़ नर्स दौड़ती हुई आई । 

“बीपी स्टेबल हो रहा है,” उसने कहा।

विमला की सिसकी राहत में बदल गई। विनोद ने आँखें बंद कर लीं।

कुछ देर बाद  वे लोग आयसीयू में चले आए ।

खिड़की से आती धूप आईसीयू के फ़र्श पर लकीरें बना रही थी।

अतुल अब होश में था। कमज़ोर, पर आँखों में वही पुरानी चमक।

डॉक्टर ने विमला को कुछ देर आराम करने भेज दिया था। और विनोद दवाइयाँ लेने चला गया था।

कमरे में  अब सिर्फ़ अतुल और कोमल थे।

“तुम थक गई होगी,” अतुल ने धीमे से कहा।

“थकना तो आप सिखाते थे, पापा,”
कोमल ने मुस्कुराने की कोशिश की।
“कहते थे, थक जाना बुरा नहीं, हार जाना बुरा है।”

अतुल हल्का-सा हँसा।

“मुझे लगता है,” उसने कहा, “मैं दोनों कर रहा हूँ।”

“ऐसा मत कहिए,” कोमल तुरंत बोली। “सच से डरना नहीं चाहिए,”
अतुल ने उसकी ओर देखा।
“जब आदमी बिस्तर से बँध जाता है, तो उसे अपनी सीमाएँ साफ़ दिखने लगती हैं।”

कोमल चुप रही।

“तुम मुझसे नाराज़ तो नहीं हो?” अतुल ने पूछा।
“मैंने तुम्हें बहुत दबाया…”

“नहीं,” कोमल ने धीरे से कहा।
“आपने मुझे बहुत प्यार किया। शायद डर भी उसी से आया।”

अतुल ने आँखें बंद कीं। “मैं बस ये नहीं चाहता कि तुम अकेली रह जाओ।”

“मैं अकेली रह सकती हूँ,” कोमल ने अपने पुराने स्वर में कहा,
फिर खुद ही रुक गई। उसे मीरा की बातें याद आ गईं ।

कोमल ने कुछ पल लिए। “मैं अपने आप में पूरी हूँ,”
उसने कहा, “पर शायद… कोई साथ हो तो जीवन अधूरा नहीं लगता।”

अतुल की आँखें नम हो गईं।

“मुझे शादी से डर लगता है,” कोमल ने सच कहा।
“मुझे लगता है मैं खुद को खो दूँगी।”

“और मुझे डर लगता है,” अतुल ने कहा,
“कि तुम किसी को खोने से डरते-डरते जीवन ही न खो दो।”

कमरे में लंबी चुप्पी उतर आई।

“पापा,” कोमल ने कहा,
“क्या भगवान किसी को भेजता है हमारे लिए?”

अतुल ने उसकी हथेली थाम ली।

“भगवान हर बार खुद नहीं आता,” उसने कहा,
“वह किसी इंसान को भेज देता है।”

“तो जीवनसाथी?” कोमल ने पूछा।

“शायद,” अतुल मुस्कुराया,
“ईश्वर का सबसे प्यारा उपहार ।”

कोमल की आँखों में अजनबी-सी नमी थी।

“मैं भागना नहीं चाहती,” उसने कहा।
“लेकिन मैं जल्दबाज़ी भी नहीं कर सकती।”

अतुल ने उसका हाथ दबाया।

“भाग मत,” उसने कहा।
“बस खुली रहो।”

और उस कमरे में जहाँ मौत की छाया थी,
पहली बार एक नई शुरुआत की रोशनी भी थी।

अतुल की साँसें पहली बार उस दिन बिना डर के चल रही थीं ।

 

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मैं तो एक चराग़ हूँ

यह दीपावली कविता “मैं तो एक चराग़ हूँ” सभी को उजाला और उम्मीद देती है।

ख़ुद को जलाकर, दुनिया तेरी रौशन करता रहूँगा,
मैं तो एक चराग़ हूँ, यूँ ही सदा जलता रहूँगा।

न शिकवा हवा से मुझे, न गिला आँधियों से,
जज़्बा-ए-रौशनी दिल में लिए, जलता रहूँगा।

कभी शम्मा बनूँ, या कभी शोला बन जाऊँ,
मक़सद मेरा उजाला है — फैलाता रहूँगा।

दीवारें रोकें, चाहे डराएँ घने साये मुझको,
अपने उजाले से हर अँधेरा चीरता रहूँगा।

जब कभी उदासी घिर आए वक़्त के अंधेरों में,
उदास आँखों में आशा की चमक भरता रहूँगा।

गर कभी घिर जाओ तुम उजालों से अंधेरों में ,
तेरे अंधेरों का निगेहबान बन डटता रहूँगा।

तेरी खामोश नज़रों में जो हल्की-सी चमक है,
मेरा ही अक्स है — इसी गुमाँ में जीता रहूँगा।

तू साथ दे या फिर किनारा कर ले मुझसे,
तेरी राहों में सदा रौशनी करता रहूँगा।

तेरी मुस्कराहट पर मेरी रौशनी भी शर्माए ,
तेरी मुस्कराहट का तलबगार बनता रहूँगा।

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Hindi ke mukh se

 संस्कृत   की    गंगोत्री से   निकलकर
समयचक्र के   साथ खुद को ढाला है।
उर्दू से   मिलकर, मैथली ,   मारवाड़ी ,
कहीं अवधी तो कहीं भोजपुरी में ढलकर ,
सिंधी ,पंजाबी ,बांग्ला और तमाम भाषाओँ से जुड़कर ,
मैंने समस्त भारत को एक सूत्र में बांधा है।

किसी भाषा से मुझे कोई बैर नहीं ,
कोई    भाषा   मेरी    गैर     नहीं।
कोई      मौसी ,     चाची     है तो ,
कोई         सखी      सहेली     है।
कोई   पड़ोसन , कोई अतिथि तो ,
कोई   मेरी दुल्हन  नयी नवेली है।

जनगण के अधरों के स्पंदन में ,
मैं     ही    तो     बसती      हूँ।
सोच  समझ और    सपनों को ,
मैं        ही    तो     रचती    हूँ।

मम्मी, डैडी ,अंकल ,आंटी आदि ,
नित नए शब्दों को अपनाया है।
तुम्हारी सहज सरलता की खातिर ,
अपना आँचल हरदम फैलाया है।

मेरी     भी    एक अभिलाषा है , मन   में   एक आशा है,
मेरा    रूप    श्रंगार करो ,    प्रयोग करो ,    प्रसार करो ,
अधरों के स्पंदन से ,  अपने कर    कमलों तक ले आओ ,
जब भी लिखो  कुछ कागज़ पर ,मेरी लिपि ही अपनाओ।
न बांधों हिंदी दिवस के बंधन में , मुझे    हरदम याद करो ,
मुझको तो तुम बस प्यार करो , मेरी सुंदरता को संसार करो।

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इश्क़

यूँ तो ज़माना मुझे ग़ाफ़िल समझता है,

मेरा यार मुझे मगर, क़ातिल समझता है।

 

दरिया-ए-इश्क़ में ख़ुद को फ़ना कर डाला,

मेरा दिलबर मुझे मगर, बातिल समझता है।

 

ग़ुरूर-ए-हुस्न ने मेरा दिल तोड़ा हज़ार बार,

मेरा दिल है कि उसको साहिल समझता है।

 

ग़म-ए-हयात को पीकर भी मुस्कुराता हूँ,

हर कोई मुझको बड़ा क़ाबिल समझता है।

 

मेरे जज़्बात की कीमत कहाँ समझे कोई,

हर कोई दर्द को मेरा हासिल समझता है।

 

तेरे नक्श-ए-कदम पर चला हूँ उम्रभर,

मगर तू मेरी राह को नाक़ाबिल समझता है।

 

निगाहें मेरी कभी उससे जो मिलीं चुपके,

वो तो उसे बस इक मुक़ातिल समझता है।

 

वो जो अश्कों से रूह को सींचा मैंने,

क्यूँ नहीं इस बात को वो आक़िल समझता है।

 

ख़ामोशी अब तेरी दास्ताँ बन गयी ए ‘इश्क़ ‘,

वो क्या समझे, जो ये दिल-ए-आदिल समझता है।

 

बातिल = झूठ, मिथ्या (False, Untrue): जो सत्य न हो।

मुक़ातिल = हत्यारा या क़त्ल करने वाला (Killer, Slayer)

आक़िल = बुद्धिमान (Intelligent),समझदार (Sensible),अक्लमंद (Wise)

‘दिल-ए-आदिल’ =न्यायप्रिय हृदय या इंसाफ़पसंद दिल (A just or fair heart)

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अध्याय 1: वह मुलाक़ात | Hindi Story | Sherlock The Cat

“यह Hindi Story ‘अध्याय 1: वह मुलाक़ात’ Sherlock The Cat की रहस्यमयी यात्रा की शुरुआत है। यह हिंदी कहानी आपको एक रोमांचक और अद्भुत दुनिया में ले जाएगी।”

सारा की शामें अब उसके जीवन की एकमात्र सुकून भरी घड़ियाँ बन चुकी थीं। कोलकाता के उनके बंगले का विशाल बाग़ीचा उसके लिए एक पनाहगाह था, जहाँ वह उन भारी दबावों को थोड़ी देर के लिए भूल सकती थी, जो उस पर हमेशा हावी रहते थे। घने हरियाली और पत्तों की सरसराहट के बीच उसे शांति मिलती थी, हालाँकि उसका मन अक्सर उन चिंताओं और पछतावों की ओर भटक जाता था जो उसे हर दिन सताते थे।

एक शाम, जब वह बाग़ीचे में टहल रही थी, अपने विचारों में डूबी हुई, तभी कुछ असामान्य उसकी नज़र में आया। एक घनी झाड़ियों के पीछे से हल्की सी हरकत ने उसका ध्यान खींचा। सारा चौंक गई, और उसने धुंधलके में आँखें गड़ाकर देखा। वहाँ कुछ हल्का और भुतहा सा परछाईयों में हिल रहा था। उसकी जिज्ञासा और बढ़ गई, और वह धीरे-धीरे उस ओर बढ़ने लगी, उसके कदम सधे हुए और सावधान थे।

जैसे ही उसने अंधेरे में झाँका, उसने देखा—एक बिल्ली, पर यह कोई साधारण बिल्ली नहीं थी। यह बेहद खास थी, उसकी आँखें सारा को मंत्रमुग्ध कर गईं। एक आँख गहरी, लगभग परलौकिक नीली थी, जबकि दूसरी आँख गहरी और रहस्यमयी काली थी। इस विचित्र आँखों वाली बिल्ली को देखकर सारा के भीतर एक अजीब सी जुड़ाव की भावना जाग उठी।

“अरे, तुम कौन हो?” उसने धीमे से फुसफुसाया, घुटनों के बल बैठते हुए और अपना हाथ बिल्ली की ओर बढ़ाया। “तुम कहाँ से आई हो?”

बिल्ली सतर्क थी, लेकिन जिज्ञासु भी। उसने अपनी दूरी बनाए रखी, लेकिन उसकी निगाहें सारा की आँखों से हट नहीं रही थीं। कुछ पल के लिए, वे दोनों एक-दूसरे को देखते रहे, मानो उनके बीच कोई अनकहा संवाद हो रहा हो।

“तुम भी अलग हो, है ना?” सारा ने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ लगभग फुसफुसाहट की तरह थी। “मेरी तरह।”

बिल्ली ने अपनी पूंछ हिलाई, उसका शरीर का हावभाव कुछ दूरी बनाए रखने वाला, लेकिन एक ही समय में आकर्षित भी। उसने एक कदम आगे बढ़ाया, फिर तुरंत पीछे हट गई, और इससे पहले कि सारा कुछ कर पाती, वह शाम के धुंधलके में गायब हो गई।

“रुको… मत जाओ,” उसने पुकारा, लेकिन बिल्ली पहले ही ओझल हो चुकी थी, सारा को एक अजीब से खालीपन के एहसास के साथ छोड़ते हुए।

अगले कुछ दिनों में, सारा उस बिल्ली की याद को भुला नहीं पाई। हर शाम, वह फिर से बाग़ीचे में लौटती, उसकी आँखें झाड़ियों को खंगालतीं, उस रहस्यमयी प्राणी की एक और झलक पाने की उम्मीद में।

“तुम कहाँ हो, ?” वह हवा में धीरे से फुसफुसाई , उसका दिल धड़क रहा था ।

लेकिन बिल्ली रहस्यमयी बनी रही, जैसे वह केवल उसकी कल्पना का हिस्सा हो। फिर भी, उस छोटी सी मुलाक़ात ने सारा के भीतर कुछ जगा दिया था—एक जिज्ञासा, एक जुड़ाव की तड़प, जो उसने बहुत लंबे समय से महसूस नहीं की थी। बाग़ीचा, जो कभी केवल वास्तविकता से बचने की जगह था, अब एक नई संभावनाओं से भरी जगह बन गया था, जहाँ वह विचित्र आँखों वाली बिल्ली फिर से दिखाई दे सकती थी और उस रहस्य को सुलझा सकती थी जो उसे घेरे हुए था।

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Shatranj शतरंज

तुम हो वज़ीर हुश्न के, जिधर चाहो, रुख कर लो,
मैं तेरी आशिकी का प्यादा हूँ, लौटने का हुनर हमको नहीं आता।

हो तेरी हर चाल में शोखी-ए-उस्तादी, इसकी बिसात पर,
हम तो बढ़ चले तेरे इश्क़ में, हारना-जीतना हमको नहीं आता।

तेरी चाहत की बाज़ी में, हमको मरना भी कबूल है,
शह और मात का है ये खेल, तेरे लिए, हमको ये हुनर नहीं आता।

अजीब खेल है ये शतरंज का, हर मोहरे की चाल मुक़र्रर है,
कुर्बान हो जाएं सब बादशाह की खातिर, ये खेल हमको समझ नहीं आता।

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Bachpan

याद आतीं हैं मुझको, वो बचपन की बातें,
वो    लम्बी   दुपहरी ,    वो छोटी सी रातें ।

वो नानी के किस्से ,        वो अब्बू की ऊँगली ,
वो बिजली कड़कना , माँ के आँचल में छुपना।

मेरी      बीमारियों में ,     माँ की आँखों    में आंसू ,
वो  थपकी से सुलाना ,   वो  परियों की कहानी।

वो       तितली    पकड़ना ,   पकड़कर उड़ाना ,
छोटी   छोटी बातों    पर, रोना और मुस्कुराना।

वो      मिटटी के    घरोंदे , वो गुड़िआ की शादी ,
वो      लकड़ी    का    घोडा ,    वो बच्चे बाराती।

वो     घंटी      की टनटन , वो    बारिश की छुट्टी ,
वो      कागज़   की कश्ती , वो   बारिश का पानी।

वो     पतंगें      लपकना ,       लड़ना    झगड़ना ,
वो        टीलों     पे चढ़ना ,      गिरकर संभालना।

वो        छोटा      सा बस्ता ,     कम थीं    किताबें ,
वो     कैसी     थी      मस्ती ,     अनोखी थीं    बातें।

अब      तरक्की       बहुत है ,      बचपन    अकेला ,
दौलत         की    दौड़ का, अब     लगता है    मेला।

रौशनी      की    चकाचोंध में ,   दिल    है      अकेला ,
माँ-बाप          के ख्यालों   में ,   फ़िक्र का    है   रेला।

कैर्रिएर         की     टेंशन ,       ये     दुनिया के मसले ,
ग्रेडिंग         की      चाहत ,     ये     कोचिंग  के लफड़े।

अब         कहाँ     है वो    बचपन ,     बचपन की रवानी ,
कहाँ खो गयी वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी।

Inspired by Ghazal   “वो  कागज़   की कश्ती , वो  बारिश का पानी”  by Jagjit Singhji

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Kirdaar

तमाम झूठे इल्ज़ाम तुम पर हों,
फिर भी सर झुकाना ग़र फितरत है ।

और सारे शक-ओ-ग़ुबार तुम पर हों,
पर ख़ुद पर भरोसा करना हिम्मत है ।

सब्र करना ग़र तेरे किरदार में है ,
तो फिर इंतज़ार कहाँ ज़हमत है ।

नफ़रतों का जवाब नफ़रत नहीं बेशक़,
रक़ीबों में हुनर ढूँढना एक इबादत है ।

ख़्वाबों की ताबीर अच्छा शग़न है,
ग़र ख़्वाब मंज़िल हैं तो हिमाक़त है ।

ख़यालों में उड़ान है तो कोई हर्ज नहीं,
ग़र ख़याल मक़सद है तो हिमाक़त है ।

कोई आफ़त हो या हो ज्श्न-ए कामयाबी,
इत्मिनान रखना फज़ले इफ़्फ़त है ।

जिस्म-ओ-जान टूट भी जाये तो क्या,
एक नेक इरादा है, जो तेरी हिम्मत है ।


(Inspired by  Poem  “If…” by Rudyard Kipling)

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Darakht

न    काटो   बेदर्दी    से पेड़ों को , शाखों को दर्द होता होगा ,
परिंदों का बसेरा हैं इन पर ,उनका दिल भी तो रोता होगा।

सुबह-ओ- शाम होती हैं परिंदों की चैचहाहट की सरगम ,
न    जाने     कैसी    शाम    और   अब   कैसा सवेरा होगा।

इनकी चाहत में बादल भी झुक आतें है , प्यार बरसाते हैं,
बिन  बारिश क्या इस धरती पर अपना भी गुजारा होगा।

हवाओं     के     संग     झूम    उठती   हैं ये नाजुक पत्तियां ,
आज़ाद    हवाओं का न जाने अब किससे याराना होगा।

ज़िन्दगी    का    सिलसिला , हमारी   साँसों    में इनसे हैं
बिन    पेड़ों      के    क्या   इंसान का नामो-निशां होगा।

तो आओ आज हम अहद कर लें ,
एक बूढ़े दरख़्त की रुखसती से पहले ,
दो पौधों को जवाँ कर लें ।।  

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