याद आतीं हैं मुझको, वो बचपन की बातें,
वो लम्बी दुपहरी , वो छोटी सी रातें ।
वो नानी के किस्से , वो अब्बू की ऊँगली ,
वो बिजली कड़कना , माँ के आँचल में छुपना।
मेरी बीमारियों में , माँ की आँखों में आंसू ,
वो थपकी से सुलाना , वो परियों की कहानी।
वो तितली पकड़ना , पकड़कर उड़ाना ,
छोटी छोटी बातों पर, रोना और मुस्कुराना।
वो मिटटी के घरोंदे , वो गुड़िआ की शादी ,
वो लकड़ी का घोडा , वो बच्चे बाराती।
वो घंटी की टनटन , वो बारिश की छुट्टी ,
वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी।
वो पतंगें लपकना , लड़ना झगड़ना ,
वो टीलों पे चढ़ना , गिरकर संभालना।
वो छोटा सा बस्ता , कम थीं किताबें ,
वो कैसी थी मस्ती , अनोखी थीं बातें।
अब तरक्की बहुत है , बचपन अकेला ,
दौलत की दौड़ का, अब लगता है मेला।
रौशनी की चकाचोंध में , दिल है अकेला ,
माँ-बाप के ख्यालों में , फ़िक्र का है रेला।
कैर्रिएर की टेंशन , ये दुनिया के मसले ,
ग्रेडिंग की चाहत , ये कोचिंग के लफड़े।
अब कहाँ है वो बचपन , बचपन की रवानी ,
कहाँ खो गयी वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी।
Inspired by Ghazal “वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी” by Jagjit Singhji

बचपन की सुनहरी यादे जवाँ हो गई 🌹❤
बहुत अच्छे अशआर आदरणीय। और यह आज की नहीं बल्कि हमेशा से ही हर उस इंसान की ज़िंदगी की हक़ीक़त रही है जो किसी ख़ास career से जुड़ा हुआ है। माशाअल्लाह। ज़िंदाबाद जनाब। नमस्ते सर।
Very very realistic and heart touching lines sir.
Each and every line/words relates to every person.
वाकई मे वो बचपन मे एक लागाव था छुट्टियों का बेसब्री से इंतेज़ार और दादी, नानी के यंहा जाना नींद गायब कर देता था। आज के बच्चों को इस दौर मे नसीब नही
Sir assalamakum.sir aap ki kavita mey bachpan se lekar jawani Tak ka Safar likh Diya hai
Thanks