कभी आसान कोई मंज़िल नहीं मिलती
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आओ नए साल में कुछ काम करें,
चलो पैग़ाम-ए-मुहब्बत आम करें ।
वक़्त के साथ बहना बहुत आसाँ है,
चलो इंसानियत के कुछ काम करें ।
ख़ुशियों में साथियों की कमी नहीं,
चलो किसी के दर्द को शाम करें।
चार दिन की है ज़िंदगी इस जहाँ में,
चलो दीवार-ए-दुश्मनी तमाम करें ।
तमाम नेमतें अता की हैं रब ने हमें,
कुछ न कुछ तो किसी के नाम करें ।
इक तल्ख़ी मिज़ाज में है कु-ब-कू,
चलो नयी फ़ज़ा का इंतिज़ाम करें।
अभी बहुत दूर है मंज़िल-ए-अमन,
भला कैसे अभी हम आराम करें ।
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