Chain-ki-ek-saans

चैन  की एक सांस

अध्याय 1: बरामदे की धूप और एक ख़बर

बरामदे में धूप एक थकी हुई चादर की तरह बिछी थी। हवा में जनवरी की हल्की ठंडक थी, पर अतुल के भीतर एक अजीब-सी बेचैनी उमड़ रही थी। वह कुर्सी पर बैठा अख़बार खोले हुए था, मगर शब्द उसकी आँखों से टकराकर लौट जाते थे। वह पढ़ नहीं रहा था — बस समय काट रहा था।

मोबाइल पर एक हल्की-सी बीप हुई।

सील का नाम चमका।

अतुल ने बिना किसी खास उत्सुकता के स्क्रीन खोली।
संदेश छोटा था — मगर जैसे किसी ने भीतर से कुछ तोड़ दिया हो।

“सर, सुरेश नहीं रहा।”

उसके नीचे एक और मैसेज था — सुरेश की पत्नी का।
अधूरी पंक्तियाँ, टूटे वाक्य, जैसे शब्द भी रो रहे हों।

अतुल का हाथ रुक गया।
मोबाइल उसकी उँगलियों में यूँ ही अटका रह गया।

सुरेश…

वही सुरेश, जो कोलकाता में उसका ड्राइवर था।
हर सुबह ठीक समय पर गाड़ी लेकर दरवाज़े पर खड़ा, होंठों पर शिष्ट मुस्कान और वही सधी हुई आवाज़;
“नमस्ते साहब।”

कभी शिकायत नहीं।
कभी बीमारी नहीं।
बीमारी का बहाना भी नहीं।

अभी दो साल पहले की ही तो बात थी , वह बिल्कुल ठीक था।

अतुल ने झट से सील को फोन मिला दिया।

“हाँ साहब…”
सील की आवाज़ में भी एक बोझ था।

“क्या हुआ?” अतुल ने धीमे से पूछा।

“लिवर की प्रॉब्लम थी, सर… सब अचानक हो गया।”

अचानक।

फोन उसके कान से लगा था, पर सील की आवाज़ जैसे बहुत दूर से आ रही थी।

“अचानक… ज़िंदगी अक्सर अचानक ही तो खत्म होती है,”
अतुल ने मन ही मन कहा।

एक पल के लिए उसे कुछ राहत-सी हुई।

सुरेश के बच्चे सेटल थे।
बेटा नौकरी में था।
बेटी की शादी हो चुकी थी।

“कम से कम सुरेश चैन से तो गया होगा,”उसने खुद से कहा।

और उसी क्षण , उसके भीतर किसी कोने  ने कोमल का नाम लिया।

कोमल।

नौकरी में, आत्मनिर्भर, मज़बूत।
दुनिया के सामने आत्मविश्वास से भरी हुई।
लेकिन… अकेली।

बस शादी नहीं करना चाहती।

शादी की बात छेड़ो तो जैसे भीतर आग लग जाती है।

अतुल को अनायास  कोमल के शब्द कानों मे गूंज गए;

“पापा, शादी के लिए कोई उम्र की सीमा नहीं होती,”
उसने वह ठंडे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा था ।
“जब मेरा सोलमेट मिलेगा, तब शादी हो जाएगी।
और अगर ऊपर वाले ने सोलमेट बनाया ही नहीं, तो शादी ज़रूरी क्यों है?
इंसान सिंगल भी तो रह सकता है।”

अतुल की छाती में कहीं गहरी-सी टीस उठी।

अगर उसे कुछ हो गया…
तो कोमल का क्या होगा?

कौन होगा जो उसके बुखार में उसके माथे पर हाथ रखेगा?
कौन होगा जो रात की चुप्पी में उसके डर सुनेगा?

सुरेश चला गया था, शायद चैन से गया था, क्योंकि उसके बच्चे अपने-अपने जीवन में सुरक्षित थे, अकेले नहीं थे ।

और उसकी बेटी?

बरामदे में धूप धीरे-धीरे सरक रही थी। पर अतुल के भीतर एक लंबी परछाईं फैल चुकी थी। वह पहली बार साफ़ महसूस कर रहा था, मौत से ज़्यादा डरावना होता है किसी अपने को अकेला छोड़ जाना।

 

अध्याय 2 : खामोश कमरों की लड़ाई

रसोई से बर्तनों की आवाज़ आ रही थी,
कुछ ज़्यादा तेज़, कुछ ज़्यादा तीखी।
जैसे हर प्लेट, हर कटोरी के साथ विमला अपने भीतर का ग़ुस्सा भी पटक रही हो।

अतुल बरामदे से उठकर अंदर आया।
घर वैसा ही था,
साफ़, सलीकेदार, शांत।
पर उस शांति के नीचे एक खदबदाती हुई बेचैनी थी।

“आज भी आप बेटी को फ़ोन नहीं करेंगे?”
विमला ने बिना उसकी ओर देखे कहा।
आवाज़ में सवाल कम, शिकायत ज़्यादा थी।

अतुल ने कुर्सी खींचकर बैठते हुए थकी हुई साँस ली।
“क्या कहूँ?”
उसने धीरे से कहा।
“वही शादी की बात? हर बार वही?”

विमला ने प्लेट सिंक में रखी—कुछ ज़्यादा ज़ोर से।
“तो फिर कब कहेंगे?”
उसकी आवाज़ ऊँची हो गई।
“आपको पता भी है वह कितनी बड़ी हो चुकी है?”

“पता है,”
अतुल ने बिना नज़र मिलाए कहा।
“पर क्या उसे पता है कि अकेलापन क्या होता है?”

विमला पलटकर उसकी ओर देखी।
उसकी आँखों में थकान थी, पर उससे ज़्यादा डर।
“आप ही ने उसे ये सब सिखाया है, वो आप से ज्यादा खुली है , कैसे बाप हैं आप जो अपनी बेटी को समझ भी नहीं सकते” ।
वह लगभग चिल्ला उठी।
“हमेशा उसकी तरफ़दारी, हमेशा आज़ादी!
अब भुगतिए।”

कमरे में एक सन्नाटा उतर आया।

इतनी लड़ाइयों के बाद
अब शब्द भी थक गए थे।

अतुल खड़ा हुआ।
“हर बात में मेरी ही गलती होती है, है न?”
उसकी आवाज़ पहली बार काँपी।
“मैं भी तो उसी का पिता हूँ, विमला।
क्या मुझे उसे समझने का हक़ नहीं?”

“समझने के नाम पर आप उसे ढाल बना लेते हैं,”
विमला ने कटु स्वर में कहा।
“और मैं हर रात यही सोचती रहती हूँ कि अगर हम दोनों चले गए तो वह अकेली कैसे जिएगी?”

अतुल के पास कोई जवाब नहीं था।

वह उस रात अपना तकिया उठाकर ड्रॉइंग रूम में चला गया।
बस यूँ ही। बिना कुछ कहे ।

और फिर वही उसका कमरा बन गया।

विमला ने भी कभी उसे वापस बुलाने की कोशिश नहीं की।

दिन बीतते गए। अतुल कम बोलने लगा।उसने सीख लिया था कि कोई भी बातचीत किसी न किसी मोड़ पर कोमल की शादी पर आकर एक कड़वे अंत में बदल जाती है। रात को उसे नींद नहीं आती थी। वह शतरंज की बिसात खोल लेता।

मोहरों की दुनिया साफ़ थी, या तो जीत, या हार। कोई भावनात्मक उलझन नहीं। कोई बेटी नहीं। कोई पत्नी नहीं। बस काले और सफ़ेद मोहरे। रात-रात भर वह अकेले चालें चलता रहता। यही उसका घर से भागने का रास्ता बन गया था।

एक दिन ऑफिस में मीटिंग चल रही थी। एयर-कंडीशनर की ठंडी हवा के बीच अतुल के सीने में अजीब-सी जकड़न उठी।साँस भारी होने लगी।
पसीना।
चक्कर।

टेबल, कुर्सियाँ, चेहरे—सब घूमने लगे।

फिर अंधेरा।

जब आँख खुली
तो सामने सफ़ेद छत थी।
मशीनों की धीमी बीप-बीप।
और पास खड़ी विमला का काँपता हुआ चेहरा।

“स्ट्रेस से हार्ट पर असर पड़ा है,”
डॉक्टर ने कहा।
“बहुत ज़्यादा दबाव है।”

दबाव?

अतुल को हल्की-सी हँसी आ गई।

अगर डॉक्टर उसके मन के भीतर झाँक पाता,
तो शायद शब्द बदल जाते।

“बहुत ज़्यादा डर है।”

 

अध्याय 3 : बेटी और मृत्यु के बीच

अस्पताल की रातें दिन से ज़्यादा लंबी होती हैं। रोशनियाँ बुझती नहीं है पर  अँधेरा फिर भी मन के भीतर उतर आता है।

अतुल बिस्तर पर लेटा छत को देख रहा था।
मशीनों की बीप-बीप जैसे उसके दिल की धड़कनों को गिन रही हो।

विमला पास की कुर्सी पर बैठी थी,  
सीधी, चुप, जैसे किसी अनकहे अपराध के लिए सज़ा काट रही हो।

तभी दरवाज़ा खुला।

कोमल थी।

बेंगलुरु से सीधे आई हुई,  आँखों के नीचे थकान, चेहरे पर घबराहट।

“पापा…”

एक शब्द।
बस एक शब्द।

पर उसमें कई  दिनों की दूरी एक पल में सिमट आई।

अतुल ने उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में वही डर था
जो वह खुद वर्षों से दबाए बैठा था।

कोमल ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया।
वही हाथ
जो कभी उसे चलना सिखाता था,
आज खुद सहारे को तरस रहा था।

“आप ठीक हैं न?”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।

अतुल मुस्कुराने की कोशिश की।
“डॉक्टर तो यही कहते हैं।”

वह चुप हो गई।

उस चुप्पी में
अतुल ने उसकी सारी लड़ाइयाँ सुन लीं।

“मैं तुमसे कुछ नहीं माँगूँगा,”
उसने धीमे से कहा।
“बस इतना बताओ, तुम खुश हो?”

कोमल ने उसकी ओर देखा।
कुछ कहना चाहा…
फिर रुक गई।

खुश?

शायद यही सबसे कठिन सवाल था।

नर्स आई।
“पेशेंट को आराम चाहिए,”
उसने कहा।

कोमल को बाहर जाना पड़ा।

वह कॉरिडोर की बेंच पर बैठ गई।
अस्पताल की गंध,
लोगों की फुसफुसाहट,
मशीनों की आवाज़, सब उसे भीतर तक थका रहे थे।

सब कहते हैं—
वह ज़िद्दी है।
आधुनिक है।
खुदगर्ज़ है।

पर कोई यह नहीं पूछता—
क्यों?

वह शादी से डरती थी।
इसलिए नहीं कि वह किसी से प्यार नहीं कर सकती, बल्कि इसलिए कि उसने अपने आसपास इतनी औरतों को
शादी के बाद खुद से दूर होते देखा था। अपनी आवाज़ खोते हुए। अपने सपने समेटते हुए।

और उससे कहा जाता है, “डर क्यों लगता है?”

वह जानती थी, वह भाग नहीं रही है।
वह बस खुद को बचा रही है।

पर आज, पिता को उस सफ़ेद बिस्तर पर देखकर उसकी सारी तर्कशीलता कहीं ढह गई थी।

शायद हर मज़बूत बेटी के भीतर एक डरी हुई बच्ची भी रहती है। और आज वह बच्ची जाग गई थी।

 

अध्याय 4: पीछे लौटता हुआ समय

अस्पताल की रात धीरे-धीरे गाढ़ी हो रही थी। खिड़की के बाहर शहर की रोशनियाँ तारों को ढक रही थीं। अतुल को नींद कहाँ आने वाली थी। मशीनों की बीप-बीप किसी दूर की घड़ी जैसी लग रही थी, हर सेकंड को ज़रा ज़्यादा ज़ोर से गिनती हुई। उसने आँखें बंद कीं। और समय पीछे चल पड़ा।

एक टूटा हुआ सा घर।
कच्ची दीवारें।
बरसात में टपकती छत।

उसका बचपन।

पिता—पीडब्ल्यूडी में खलासी।
हर सुबह कंधे पर औज़ारों की थैली।
और माँ, दिन भर चूल्हे और चिंता के बीच उलझी हुई।

गरीबी वहाँ शोर नहीं करती थी, वह हर चीज़ में चुपचाप घुली रहती थी।

पर पिता ने कभी बच्चों की पढ़ाई में कमी नहीं आने दी।

“पढ़ ले बेटा,”
वे कहते थे,
“ताकि तुझे मेरी तरह ज़िंदगी से लड़ना न पड़े।”

अतुल पढ़ता था, भूख के साथ, कमज़ोर चप्पलों के साथ,फटे कपड़ों के साथ,और एक ज़िद के साथ।

वह हमेशा अव्वल आता।धीरे-धीरे घर के हालात बदले।बड़े भाई नौकरी में लग गए।उसका दाख़िला
भी एक अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया।अब उसके होंठों पर अक्सर मुस्कान रहती। एक बार ट्रेन में
एक अजनबी ने कहा था, “बेटा, यह मुस्कान मत खोना।बहुत आगे जाओगे।” आज उसे वह आदमी याद आ रहा था।

फिर समय आगे खिसका।

कॉलेज।
हॉस्टल।
पहली नौकरी।

और फिर
रेलवे में ग्रुप–A अफ़सर।

पिता की आँखों में जो गर्व चमकता था, उससे बड़ा कोई इनाम नहीं था।

उसने ईमानदारी चुनी।
दो नंबर की कमाई से दूर रहा।

शायद इसीलिए वह कभी अमीर नहीं हुआ, पर कभी शर्मिंदा भी नहीं हुआ।

फिर विमला आई।

खूबसूरत।
सलीकेदार।
आँखों में भविष्य के सपने।

उनकी शादी हुई।

छोटा-सा घर।
छोटी-सी खुशियाँ।

और फिर
कोमल।

जब उसने पहली बार अपनी बेटी को गोद में लिया, तो लगा जैसे दुनिया ने उसे एक नाज़ुक-सी ज़िम्मेदारी सौंप दी हो। “इसे कभी दुख नहीं होने दूँगा,” उसने खुद से वादा किया था। फिर बेटा आया। और घर हँसी से भर गया।

वीकेंड पर वह बच्चों के लिए खाना बनाता। फ़र्श पर बैठकर उनके साथ खेलता। वह पिता नहीं, एक बड़ा बच्चा बन जाता।

और फिर…

समय तेज़ हो गया।

बच्चे बड़े हो गए।
कोमल बेंगलुरु चली गई।
बेटा हैदराबाद।

घर में खामोशी आने लगी। विमला की चिंता बढ़ने लगी। और उसके साथ ग़ुस्सा। और उसकी अपनी चुप्पी।

शतरंज। अलग कमरा। अलग रातें।

और अब, यह अस्पताल।

अतुल की आँखों से एक आँसू तकिए में उतर गया।

“मैंने सब सही किया था,” उसने सोचा।
“तो फिर ये डर क्यों?”

और तभी सुरेश का चेहरा उभरा। सुरेश के बच्चे
सेटल थे। वह चैन से गया था।

और वह?

“काश…”
उसके भीतर से आवाज़ आई,
“मेरी बेटी भी किसी के साथ हो जब मैं न रहूँ।”

मशीन ने धीमे से बीप की।और अतुल धीरे-धीरे
वर्तमान में लौट आया।

 

अध्याय 5 : उम्मीद की धीमी वापसी

अतुल की हालत अब सुधार रही थी पर शरीर अभी भी जैसे किसी और का था। हर साँस में हल्का-सा दर्द, हर हरकत में एक अजनबी-सी थकान।

डॉक्टरों ने कहा,
“ख़तरा टल गया है,पर अब ज़िंदगी का तरीका बदलना होगा।”

ज़िंदगी का तरीका…अतुल ने मन ही मन मुस्कुरा दिया।
काश कोई डॉक्टर दिल के अंदर के तरीक़े भी बदल सकता।

तीन दिन बाद बेटा हैदराबाद से आ गया।

लंबा, तंदुरुस्त, जिम में तराशी हुई देह, और आँखों में वही पुरानी शरारत।

“पापा ,” उसने आते ही कहा, “अब आपको वापस फॉर्म में लाना मेरी ज़िम्मेदारी है।”

अतुल हँस पड़ा।
“तू मुझे रिटायर्ड खिलाड़ी समझ रहा है क्या?”

“रिटायर्ड नहीं,”
बेटा बोला, “रिलॉन्च।”

उसके आने से घर में कुछ हलचल लौट आई।

सुबह-सुबह वह अतुल को टहलने ले जाता। धीरे-धीरे पार्क के चक्कर बढ़े। फिर बैडमिंटन की हल्की रैलियाँ।
फिर जिम के हल्के-फुल्के उपकरण। “साँस, पापा … साँस!” वह हँसते हुए कहता।

और सच में अतुल की साँसें धीरे-धीरे गहरी होने लगीं।

विमला यह सब चुपचाप देखती। उसके भीतर एक पुरानी उम्मीद फिर से सिर उठाने लगी थी। कोमल भी देख रही थी। पिता की चाल में धीरे-धीरे लौटती मज़बूती, आँखों में हल्की चमक। शायद सब ठीक हो रहा था।

और फिर एक दिन अतुल अकेले बाहर गया। सिर्फ़ कुछ सामान लेने। सड़क पार करते हुए उसने पीछे से आती हुई तेज़ आवाज़ सुनी। फिर कुछ नहीं।

समयचक्र ने एक बार फिर अतुल को  फिर वही सफ़ेद छत और  वही मशीनें के बीच ल पटका था ।

इस बार विमला रो रही थी। खुलकर।

डॉक्टर की आवाज़ जैसे दीवारों से टकरा रही थी,

“हेड इंजरी है। अभी कुछ कहा नहीं जा सकता।”

कोमल दरवाज़े के पास खड़ी थी।उसकी दुनिया फिर से एक बिस्तर के चारों ओर सिमट गई थी।

उसे पहली बार साफ़ महसूस हुआ,  यह बार-बार अस्पताल आना इत्तेफ़ाक़ नहीं है। यह वक़्त का  कुछ इशारा है। और वक़्त कभी-कभी छूटने से पहले ज़ोर से दस्तक देता है।

 

अध्याय 6 : जब भाई दीवार बना

अस्पताल की सुबहें रातों से ज़्यादा भारी होती हैं।
रात में उम्मीद सो जाती है, सुबह डॉक्टरों की आवाज़ उसे जगा देती है।

अतुल अब भी बेहोश था।

उसके चेहरे पर वही शांत भाव था, पर मशीनों की बीप कह रही थी कि सब कुछ शांत नहीं है।

विमला कुर्सी पर बैठी थी, सीधी, जैसे अब गिरने की इजाज़त नहीं बची हो।
कोमल खिड़की के पास खड़ी थी, शहर को देखते हुए भी कहीं और देख रही थी।

तभी दरवाज़ा खुला। भाई अंदर आया। तेज़ क़दम। पर आँखों में संयम।

“डॉक्टर से बात हो गई,” उसने शांत स्वर में कहा।
“अभी कुछ घंटों में होश आ सकता है।”

विमला ने राहत की साँस ली।
कोमल ने पहली बार  भाई  की ओर ध्यान से देखा।

वह हमेशा उसे छोटा भाई ही मानती रही थी, पर आज वह किसी स्तंभ की तरह खड़ा था।

“माँ, आप घर जाकर थोड़ा आराम कर लीजिए,” उसने कहा। “मैं यहाँ हूँ।”

विमला टस से मस  नहीं हुई ।“ में तेरे पापा को इस हाल में छोड़ के कैसे जा सकती हूँ “
 विनोद ने कहा , “ माँ , तुम्हें हम लोगों का भी तो ख्याल रखना है’ तुम भी बीमार हो जाओगी तो हम लोगों का ख्याल कौन रखेगा ? चली जाओ  और कुछ देर बाद आ  जाना”

विमला  ने अनमने मन से कहा “तू रहेगा न यहाँ ?”

“ हाँ माँ , मैं हूँ न,” उसने सहजता से कहा।

विमला चली गई। कमरे में कोमल और उसका भाई रह गए।

कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर भाई बोला, “तुम हमेशा सब  कुछ अकेले  करना चाहती  हो, है न?”

कोमल चौंकी। “क्या मतलब?”

“तुम मजबूत बनने की कोशिश करती हो,” उसने कहा।
“पर मजबूत होना अकेले होना नहीं होता।”

कोमल ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गई।

 भाई ने धीरे से कहा,“मुझे ऐसी sपरेशानी मे अकेले  रहने से  डर  लगता है।”

कोमल ने पहली बार किसी पुरुष को यह कहते सुना।

“मुझे कोई चाहिए,” उसने आगे कहा।
“जो तब भी रहे जब मैं थक जाऊँ।”

कमरे में एक नई चुप्पी उतर आई।

कोमल को अपने सारे तर्क अचानक थोड़े खोखले लगने लगे।

शायद आज़ादी कभी-कभी किसी का हाथ थामने से छोटी नहीं होती।

तभी मशीन ने एक अलग-सी आवाज़ की।

अतुल की उँगली हल्की-सी हिली। और कमरे में जैसे साँस लौट आई।

 

अध्याय 7: अकेलेपन का सच

आईसीयू के बाहर बैठकर कोमल का दम घुटने लगा था। वह बस कुछ देर के लिए चलते हुए खुद को समेटना चाहती थी। तभी पास के वार्ड से एक कमजोर-सी आवाज़ आई,

“दीदी… पानी…”

कोमल रुक गई। आवाज़ में दर्द से ज़्यादा अकेलापन था।

वह अंदर चली गई। बिस्तर पर एक लड़की लेटी थी।
पैर पर प्लास्टर, माथे पर पट्टी, चेहरे पर चोटों के निशान।

कमरे में किसी और के होने का कोई नामोनिशान नहीं था ,  न कोई  बैग, न कोई चप्पल।

कोमल ने गिलास उठाया और उसके होंठों तक ले गई।

“धन्यवाद,” लड़की ने धीमे से कहा।

“आपका कोई साथ आया नहीं?” कोमल ने पूछा।

लड़की कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “आने को कोई है ही नहीं।”

“मतलब?”

“माँ-बाप पिछले साल कोविड में चले गए।”
उसकी आवाज़ सपाट थी, जैसे रो-रोकर सूख चुकी हो।

“और कोई रिश्तेदार?”

“सब दूर हैं…
और आजकल दूरवाले पास नहीं आते।”

कोमल चुप हो गई।

कुछ पल बाद उसने कहा—
“आपका नाम क्या है ? “आप बहुत हिम्मतवाली लगती हैं।”

लड़की ने हल्की-सी हँसी हँसी।
“मीरा नाम है मेरा” । “हिम्मत तब तक लगती है जब तक सब ठीक चलता है।” उसने जबाब दिया ।

“आप यहाँ अकेले हैं,” कोमल ने कहा, “डर नहीं लगता?”

मीरा ने उसकी ओर देखा। “बहुत।”

“तो आपने शादी क्यों नहीं की?”
कोमल ने अनायास पूछ लिया। फिर खुद ही चौंकी।

मीरा कुछ पल उसे देखती रही। फिर बोली,  “क्योंकि मैं सोचती थी, मुझे किसी की ज़रूरत नहीं।
मैं अपने आप में पूरी हूँ।” अब कोमल को उसके शब्द अपने जैसे लगे।

“मैं भी यही मानती हूँ,” कोमल ने धीमे से कहा।

मीरा की आँखों में एक अजीब-सी पहचान उभरी।

“तभी तो आपने पूछा कि मैं अकेली क्यों हूँ,” उसने कहा।
“वरना ज़्यादातर लोग सिर्फ़ तरस खाकर चले जाते हैं।”

कुछ पल की चुप्पी।

“आज समझ आ रहा है,” मीरा ने कहा,
“कि आत्मनिर्भर होना अकेला होना नहीं होना चाहिए।”

“आप पछता रही हैं?” कोमल ने पूछा।

“हाँ,” मीरा ने बिना झिझक कहा।
“क्योंकि रात को जब डर लगता है,
तो कोई चाहिए जो बस कह दे, मैं हूँ।”

कोमल की आँखें भर आईं। यह पहली बार था जब किसी अजनबी की बात उसके भीतर इतनी गहराई से
उतर रही थी।

 

अध्याय 8: जहाँ ईश्वर हाथ बन गया

सुबह की रोशनी अस्पताल में अक्सर झूठी उम्मीद लेकर आती है।

विमला कुर्सी पर बैठी थीं। रुमाल उनकी मुट्ठी में पिस रहा था।

विनोद दरवाज़े के पास खड़ा था, जैसे अगर एक पल भी बैठ गया तो गिर पड़ेगा।

कोमल शीशे के पार अपने पिता को देख रही थी।
सफ़ेद बिस्तर।
सफ़ेद चादर।
मशीनों से बँधा हुआ जीवन।

डॉक्टर बाहर आया।

“ब्रेन इंजरी के कारण
स्वेलिंग बढ़ रही है,” उसने कहा।
“अगले कुछ घंटे बहुत अहम हैं।”

विमला की साँस जैसे टूट गई।

“ हे भगवान इन्हे बचा ले ?” काँपते हुए उसके होंठ बुदबुदाए।

विनोद ने माँ को संभाला। कोमल वहीं जड़ हो गई। पहली बार उसे लगा की वो पिता को खो भी सकती है।

कुछ देर बाद नर्स ने कोमल से कहा, “आपके पापा को अभी ऑब्ज़र्वेशन में रखा गया है। आप लोग अंदर नहीं जा सकते।”

कोमल बाहर, कॉरिडोर में टहलने  लगी। सिर घूम रहा था। दिल जैसे किसी ने दबोच लिया हो।

वह उसी वार्ड के पास पहुँच गई,जहाँ मीरा थी। मीरा ने उसे देखा।

“आपके चेहरे से लग रहा है कोई अपना बहुत बीमार है,” उसने कहा।

कोमल कुछ बोल नहीं पाई। बस कुर्सी पर बैठ गई।

“मैं भी ऐसे दौर से गुजर चुकी हूँ ,” मीरा ने धीमे से कहा। “माँ-बाप… एक ही हफ्ते में।” बोलते बोलते उसका गला रुँध आया ।

“जब डॉक्टर चुप हो जाते हैं,” मीरा बोली, “तो डर सबसे ज़्यादा लगता  है।”

कोमल की आँखों से आँसू खुद निकल आए।

“आपके पास लोग हैं,” मीरा ने  खिड़की की ओर देखते हुए कहा । “यह बहुत बड़ी ताक़त है।”

कोमल को अब लगने लगा था जब तक सब ठीक चल रहा है तो किसी अपने की जुरुरत शायद  महसूस  नहीं होती पर  परेशानी के  वक्त  में  इंसान कितना अकेला और असहाय होता है अगर कोई उसके साथ न हो ।

 

अध्याय 9: डर और विश्वास के बीच

 

वो रात जैसे किसी ने सबकी साँसों को उधार पर रख लिया था। अतुल को अभी भी होश नहीं आया था पर  डॉक्टर ने कहा था कि  कन्डिशन स्टैबल है । सुबह होते ही कोमल माँ और भाई के लिए चाय लेने गई । अस्पताल के कैफेटेरिया में  केतली  में चाय उबल रही थी।भाप में अदरक की गंध घुली थी।

कोमल कप पकड़कर खड़ी थी,पर हाथ काँप रहे थे। जब कैन्टीन बॉय ने चाय कोमल के कप में डाली तो चाय छलक कर तश्तरी में गिर गई।

“अरे… संभालिए।”
पीछे से किसी ने कहा।

वह मीरा थी, व्हीलचेयर पर बैठी हुई,पैर प्लास्टर में जकड़ा।

“आप यहाँ?” कोमल चौंकी।

“ड्रेसिंग बदलवाने ले जा रहे हैं,” मीरा ने कहा।
“नर्स अभी आती होगी।”

मीरा उसे देखते ही बोली,“आपकी आँखों से लग रहा है, आज बहुत मुश्किल दिन है।”

“मेरे पापा…” कोमल की आवाज़ टूट गई। “पता नहीं…”

मीरा ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।
“जब डॉक्टर चुप हो जाते हैं, तब डर बोलने लगता है।”

कोमल पहली बार खुद को रोते हुए नहीं रोक पाई।

कुछ देर बाद उसने पूछा, “आप भगवान को मानती हैं?”

मीरा चौंकी। “हाँ… मानती हूँ।”

“तो फिर,” कोमल ने कहा, “आप अकेली क्यों डरती हैं?
अगर भगवान है तो वह संभाल लेगा न?”

मीरा कुछ देर चुप रही। फिर बोली,
“मैं भी यही सोचती थी। माँ-बाप के जाने के बाद भी।”

“और अब?” कोमल ने पूछा।

“अब समझ में आ रहा है,” मीरा ने कहा,
“कि भगवान खुद आकर पानी नहीं देता। वह किसी को भेज देता है।”

कोमल ने उसकी ओर देखा।

“जैसे आप आईं,” मीरा बोली,
“अगर आप न आतीं, तो भगवान का सहारा भी मेरे लिए बहुत दूर होता।”

कोमल के भीतर कुछ हिल गया।

“तो क्या भगवान काफ़ी नहीं?” उसने पूछा।

“भगवान काफ़ी है,” मीरा ने कहा,
“पर वह चाहता है कि हम किसी को चुनें, जिसके ज़रिए वह हमें थाम सके।”

कोमल की आँखों में पिता का चेहरा उभरा।

डॉक्टर।
विनोद।
विमला।

सब लोग भगवान ही  ने तो उसके लिए भेजे गए थे।

“मैंने हमेशा सोचा,” कोमल ने धीमे से कहा,
“कि अगर मैं किसी पर निर्भर हो गई तो कमजोर हो जाऊँगी।”

मीरा मुस्कुराई। “निर्भर होना नहीं, गलत इंसान पर निर्भर होना कमज़ोरी है।”

कोमल की साँसें धीमी हो गईं।

पहली बार उसके भीतर यह विचार आया कि,

“मैं अकेले मजबूत हूँ, पर किसी के साथ शायद पूरी हो सकती हूँ ।

 

 

अध्याय 10: एक साँस जो थमी नहीं

जब कोमल कैन्टीन से अपने विचारों  में उलझी पिता के कैबिन के पास   चाय लेकर पहुंची  तो उसी छड़ नर्स दौड़ती हुई आई । 

“बीपी स्टेबल हो रहा है,” उसने कहा।

विमला की सिसकी राहत में बदल गई। विनोद ने आँखें बंद कर लीं।

कुछ देर बाद  वे लोग आयसीयू में चले आए ।

खिड़की से आती धूप आईसीयू के फ़र्श पर लकीरें बना रही थी।

अतुल अब होश में था। कमज़ोर, पर आँखों में वही पुरानी चमक।

डॉक्टर ने विमला को कुछ देर आराम करने भेज दिया था। और विनोद दवाइयाँ लेने चला गया था।

कमरे में  अब सिर्फ़ अतुल और कोमल थे।

“तुम थक गई होगी,” अतुल ने धीमे से कहा।

“थकना तो आप सिखाते थे, पापा,”
कोमल ने मुस्कुराने की कोशिश की।
“कहते थे, थक जाना बुरा नहीं, हार जाना बुरा है।”

अतुल हल्का-सा हँसा।

“मुझे लगता है,” उसने कहा, “मैं दोनों कर रहा हूँ।”

“ऐसा मत कहिए,” कोमल तुरंत बोली। “सच से डरना नहीं चाहिए,”
अतुल ने उसकी ओर देखा।
“जब आदमी बिस्तर से बँध जाता है, तो उसे अपनी सीमाएँ साफ़ दिखने लगती हैं।”

कोमल चुप रही।

“तुम मुझसे नाराज़ तो नहीं हो?” अतुल ने पूछा।
“मैंने तुम्हें बहुत दबाया…”

“नहीं,” कोमल ने धीरे से कहा।
“आपने मुझे बहुत प्यार किया। शायद डर भी उसी से आया।”

अतुल ने आँखें बंद कीं। “मैं बस ये नहीं चाहता कि तुम अकेली रह जाओ।”

“मैं अकेली रह सकती हूँ,” कोमल ने अपने पुराने स्वर में कहा,
फिर खुद ही रुक गई। उसे मीरा की बातें याद आ गईं ।

कोमल ने कुछ पल लिए। “मैं अपने आप में पूरी हूँ,”
उसने कहा, “पर शायद… कोई साथ हो तो जीवन अधूरा नहीं लगता।”

अतुल की आँखें नम हो गईं।

“मुझे शादी से डर लगता है,” कोमल ने सच कहा।
“मुझे लगता है मैं खुद को खो दूँगी।”

“और मुझे डर लगता है,” अतुल ने कहा,
“कि तुम किसी को खोने से डरते-डरते जीवन ही न खो दो।”

कमरे में लंबी चुप्पी उतर आई।

“पापा,” कोमल ने कहा,
“क्या भगवान किसी को भेजता है हमारे लिए?”

अतुल ने उसकी हथेली थाम ली।

“भगवान हर बार खुद नहीं आता,” उसने कहा,
“वह किसी इंसान को भेज देता है।”

“तो जीवनसाथी?” कोमल ने पूछा।

“शायद,” अतुल मुस्कुराया,
“ईश्वर का सबसे प्यारा उपहार ।”

कोमल की आँखों में अजनबी-सी नमी थी।

“मैं भागना नहीं चाहती,” उसने कहा।
“लेकिन मैं जल्दबाज़ी भी नहीं कर सकती।”

अतुल ने उसका हाथ दबाया।

“भाग मत,” उसने कहा।
“बस खुली रहो।”

और उस कमरे में जहाँ मौत की छाया थी,
पहली बार एक नई शुरुआत की रोशनी भी थी।

अतुल की साँसें पहली बार उस दिन बिना डर के चल रही थीं ।

 

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