इश्क़

यूँ तो ज़माना मुझे ग़ाफ़िल समझता है,

मेरा यार मुझे मगर, क़ातिल समझता है।

 

दरिया-ए-इश्क़ में ख़ुद को फ़ना कर डाला,

मेरा दिलबर मुझे मगर, बातिल समझता है।

 

ग़ुरूर-ए-हुस्न ने मेरा दिल तोड़ा हज़ार बार,

मेरा दिल है कि उसको साहिल समझता है।

 

ग़म-ए-हयात को पीकर भी मुस्कुराता हूँ,

हर कोई मुझको बड़ा क़ाबिल समझता है।

 

मेरे जज़्बात की कीमत कहाँ समझे कोई,

हर कोई दर्द को मेरा हासिल समझता है।

 

तेरे नक्श-ए-कदम पर चला हूँ उम्रभर,

मगर तू मेरी राह को नाक़ाबिल समझता है।

 

निगाहें मेरी कभी उससे जो मिलीं चुपके,

वो तो उसे बस इक मुक़ातिल समझता है।

 

वो जो अश्कों से रूह को सींचा मैंने,

क्यूँ नहीं इस बात को वो आक़िल समझता है।

 

ख़ामोशी अब तेरी दास्ताँ बन गयी ए ‘इश्क़ ‘,

वो क्या समझे, जो ये दिल-ए-आदिल समझता है।

 

बातिल = झूठ, मिथ्या (False, Untrue): जो सत्य न हो।

मुक़ातिल = हत्यारा या क़त्ल करने वाला (Killer, Slayer)

आक़िल = बुद्धिमान (Intelligent),समझदार (Sensible),अक्लमंद (Wise)

‘दिल-ए-आदिल’ =न्यायप्रिय हृदय या इंसाफ़पसंद दिल (A just or fair heart)

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