Shatranj शतरंज

तुम हो वज़ीर हुश्न के, जिधर चाहो, रुख कर लो,
मैं तेरी आशिकी का प्यादा हूँ, लौटने का हुनर हमको नहीं आता।

हो तेरी हर चाल में शोखी-ए-उस्तादी, इसकी बिसात पर,
हम तो बढ़ चले तेरे इश्क़ में, हारना-जीतना हमको नहीं आता।

तेरी चाहत की बाज़ी में, हमको मरना भी कबूल है,
शह और मात का है ये खेल, तेरे लिए, हमको ये हुनर नहीं आता।

अजीब खेल है ये शतरंज का, हर मोहरे की चाल मुक़र्रर है,
कुर्बान हो जाएं सब बादशाह की खातिर, ये खेल हमको समझ नहीं आता।

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