तमाम झूठे इल्ज़ाम तुम पर हों,
फिर भी सर झुकाना ग़र फितरत है ।
और सारे शक-ओ-ग़ुबार तुम पर हों,
पर ख़ुद पर भरोसा करना हिम्मत है ।
सब्र करना ग़र तेरे किरदार में है ,
तो फिर इंतज़ार कहाँ ज़हमत है ।
नफ़रतों का जवाब नफ़रत नहीं बेशक़,
रक़ीबों में हुनर ढूँढना एक इबादत है ।
ख़्वाबों की ताबीर अच्छा शग़न है,
ग़र ख़्वाब मंज़िल हैं तो हिमाक़त है ।
ख़यालों में उड़ान है तो कोई हर्ज नहीं,
ग़र ख़याल मक़सद है तो हिमाक़त है ।
कोई आफ़त हो या हो ज्श्न-ए कामयाबी,
इत्मिनान रखना फज़ले इफ़्फ़त है ।
जिस्म-ओ-जान टूट भी जाये तो क्या,
एक नेक इरादा है, जो तेरी हिम्मत है ।
(Inspired by Poem “If…” by Rudyard Kipling)



वाहहह जी वाहह !
जनाब यह ग़ज़ल तो नहीं लगती.
शुक्रिया । हाँ ये नज़्म की कैटेगरी में ज़्यादा सटीक बैठती है ।