न काटो बेदर्दी से पेड़ों को , शाखों को दर्द होता होगा ,
परिंदों का बसेरा हैं इन पर ,उनका दिल भी तो रोता होगा।
सुबह-ओ- शाम होती हैं परिंदों की चैचहाहट की सरगम ,
न जाने कैसी शाम और अब कैसा सवेरा होगा।
इनकी चाहत में बादल भी झुक आतें है , प्यार बरसाते हैं,
बिन बारिश क्या इस धरती पर अपना भी गुजारा होगा।
हवाओं के संग झूम उठती हैं ये नाजुक पत्तियां ,
आज़ाद हवाओं का न जाने अब किससे याराना होगा।
ज़िन्दगी का सिलसिला , हमारी साँसों में इनसे हैं
बिन पेड़ों के क्या इंसान का नामो-निशां होगा।
तो आओ आज हम अहद कर लें ,
एक बूढ़े दरख़्त की रुखसती से पहले ,
दो पौधों को जवाँ कर लें ।।


