ऐसा भी इत्तिफ़ाक़ हुआ है कभी कभी,
ये दिल गुल-ए-गुलज़ार हुआ है कभी कभी।
कुछ न चाहा उसकी उल्फ़त के सिवा,
के दुश्मन ज़माना हुआ है कभी कभी।
लर्ज़िश-ए-लब कुछ न कह पाए , न सही ,
उसने निगाहों को मिलाया है कभी कभी।
उसकी आँखों में मेरी तस्वीर हो शायद ,
उसकी आँखों में झाँका है कभी कभी।
खुद का अक्स देख उसे अपना समझ बैठे ,
पता न था ,आइना झूठ बोलता है कभी कभी।
मेरी वफ़ाएं रंग लायेंगी कभी, शायद ,
मैंने जाम-ए-ज़फ़ा पिया है कभी कभी।
राह-ए-उल्फ़त में तग़ाफ़ुल किया उसने ,
मग़र तसव्वुर में वो आया है कभी कभी।
उसकी यादों के फूल सूख न जायें कहीं ,
आँखों को अश्क़-बार किया है कभी कभी।
अब हमसे इश्क़ का आलम न पूछिए ,
खुद का इन्तिज़ार किया है कभी कभी।



