मैं तो एक चराग़ हूँ

यह दीपावली कविता “मैं तो एक चराग़ हूँ” सभी को उजाला और उम्मीद देती है।

ख़ुद को जलाकर, दुनिया तेरी रौशन करता रहूँगा,
मैं तो एक चराग़ हूँ, यूँ ही सदा जलता रहूँगा।

न शिकवा हवा से मुझे, न गिला आँधियों से,
जज़्बा-ए-रौशनी दिल में लिए, जलता रहूँगा।

कभी शम्मा बनूँ, या कभी शोला बन जाऊँ,
मक़सद मेरा उजाला है — फैलाता रहूँगा।

दीवारें रोकें, चाहे डराएँ घने साये मुझको,
अपने उजाले से हर अँधेरा चीरता रहूँगा।

जब कभी उदासी घिर आए वक़्त के अंधेरों में,
उदास आँखों में आशा की चमक भरता रहूँगा।

गर कभी घिर जाओ तुम उजालों से अंधेरों में ,
तेरे अंधेरों का निगेहबान बन डटता रहूँगा।

तेरी खामोश नज़रों में जो हल्की-सी चमक है,
मेरा ही अक्स है — इसी गुमाँ में जीता रहूँगा।

तू साथ दे या फिर किनारा कर ले मुझसे,
तेरी राहों में सदा रौशनी करता रहूँगा।

तेरी मुस्कराहट पर मेरी रौशनी भी शर्माए ,
तेरी मुस्कराहट का तलबगार बनता रहूँगा।

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